न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये। मम स्वनात् कृधुकर्णो भयात एवेदनु द्यून्किरणः समेजात्॥
na vā u māṃ vṛjane vārayante na parvatāso yad ahaṃ manasye । mama svanāt kṛdhukarṇo bhayāta eved anu dyūn kiraṇaḥ samejāt ॥
प्रधानमंत्री का संदेशभारतवर्ष की युवाशक्ति का दृढ़ संकल्प अतुलनीय है। हमारे युवा साथी जो ठान लेते हैं, वो करके दिखाते हैं। यही वजह है कि आज हमारा देश अपने सपनों को साकार कर रहा है।
न वा उ मां का अर्थ
आपके आत्मविश्वास की शक्ति गहन है। कोई भी आपके आत्मनिर्णय को कुचल नहीं सकता। बड़े पहाड़ के आकार की बड़ी बाधाएँ भी आपके मार्ग में बाधा नहीं डाल सकतीं। आप सूर्य से अधिक शक्तिशाली हैं बशर्ते आपके पास इच्छा-शक्ति हो।
शब्दार्थ
- न वै उna vai u
निश्चय ही नहीं
- माम्mām
मुझे
अस्मद्
- वृजनेvṛjane
संग्राम में
√वृज्
- वारयन्तेvārayante
रोक पाते हैं
√वृ
- न पर्वतासःna parvatāsaḥ
न पर्वत
पर्वत
- यत् अहम् मन्स्येyad ahaṁ manasye
जब मैं मन में ठान लूँ
√मन्
- मम स्वनात्mama svanāt
मेरी गर्जना से
√स्वन्
- कृधुकर्णःkṛdhukarṇaḥ
कान दबाए हुए
कर्ण
- भयातेbhayāte
भयभीत होता है
√भी
- अनु द्यून्anu dyūn
दिन-प्रतिदिन
दिव्
- किरणःkiraṇaḥ
किरण, रज
किरण
- समेजात्samejāt
हिल उठता है
सम् + √एज्
व्याख्या
ऋग्वेद के दसवें मण्डल के वसुक्र सूक्त में यह इन्द्र का प्रथम-पुरुष कथन है। इसमें कहा गया है कि दृढ़ संकल्प ('मनस्ये') के बाद न तो युद्ध के विरोधी ('वृजने') और न ही पर्वत जैसी बाधाएँ उसे रोक सकती हैं। इसमें इन्द्र की गर्जना और उससे उत्पन्न भय का मूल प्रसंग है, जबकि वीडियो इसी प्रथम-पुरुष उद्घोष को आधुनिक आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय की सीख के रूप में प्रस्तुत करता है। आधुनिक युवाओं के लिए यह आह्वान है कि वे अपनी ऊर्जा को पहचानें और असंभव को संभव कर दिखाएँ।
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।
आत्मविश्वास पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।