परकार्येषु युक्तात्मा - प्रत्येक कर्तव्य में उत्कृष्टता

22 जुल॰ 2026

परकार्येषु युक्तात्मा स्वकार्यं क्षिप्रसाधनम्। सुहृत्कार्येषु निर्वृत्तौ राजकार्येषु विक्रमः॥

parakāryeṣu yuktātmā svakāryaṁ kṣiprasādhanam । suhṛtkāryeṣu nirvṛttau rājakāryeṣu vikramaḥ ॥

परकार्येषु युक्तात्मा स्वकार्यं का अर्थ

जो व्यक्ति दूसरों के कार्यों में पूरी निष्ठा से लगा रहता है, अपने व्यक्तिगत कार्यों को शीघ्रता एवं कुशलता से पूरा करता है, मित्रों के कार्यों को निःस्वार्थ भाव से संपन्न करता है और राष्ट्र के कर्तव्यों में अपना पूर्ण पराक्रम व शौर्य प्रदर्शित करता है, वही श्रेष्ठ है।

शब्दार्थ

परकार्येषुparakāryeṣu

दूसरों के कार्यों में

पर + √कृ

युक्तात्माyuktātmā

संलग्न चित्त वाला

√युज् + आत्मन्

स्वकार्यम्svakāryam

अपना कार्य

स्व + √कृ

क्षिप्रसाधनम्kṣiprasādhanam

शीघ्र सिद्ध

क्षिप्र + √साध्

सुहृत्कार्येषुsuhṛtkāryeṣu

मित्रों के कार्यों में

सु + हृद् + √कृ

निर्वृत्तौnirvṛttau

पूर्णता में

निस् + √वृत्

राजकार्येषुrājakāryeṣu

राजकार्यों में

राजन् + √कृ

विक्रमःvikramaḥ

पराक्रम

वि + √क्रम्

व्याख्या

यह श्लोक श्रेष्ठता को भिन्न प्रकार के उत्तरदायित्वों के अनुरूप उचित गुण प्रकट करने की क्षमता के रूप में देखता है। ‘युक्तात्मा’ दूसरे के कार्य में पूरे मन से लगने का भाव देता है, जबकि ‘क्षिप्रसाधनम्’ अपने कार्य को शीघ्र ही नहीं, सफलतापूर्वक पूरा करने की ओर भी संकेत करता है। मित्र के कार्य में ‘निर्वृत्ति’, अर्थात उसे पूर्णता तक पहुँचाना, अपेक्षित है; वहीं राजकार्य में ‘विक्रम’, अर्थात दृढ़ साहस और सक्रिय पराक्रम, आवश्यक है। इस नीति की विशेषता यह है कि वह हर संबंध के लिए एक ही सुविधाजनक व्यवहार को पर्याप्त नहीं मानती। दूसरों के प्रति निष्ठा, अपने काम में दक्षता, मित्रता में विश्वसनीयता और सार्वजनिक दायित्व में निर्भीक कर्म—इन सबका अपना स्थान है। इस प्रकार श्लोक उस परिपक्व चरित्र का चित्र प्रस्तुत करता है जो परिस्थिति के अनुसार अपने आचरण का रूप बदलता है, पर प्रभावी कर्म और उत्तरदायित्व की मूल भावना को नहीं छोड़ता।

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कर्तव्य पर और सुभाषित

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कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

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साहसविनम्रतासम्मान
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भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

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स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
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महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता