अङ्गणवेदी वसुधा - संकल्प की शक्ति

12 जन॰ 2026

अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्। वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य॥

aṅgaṇavedī vasudhā kulyā jaladhiḥ sthalī ca pātālam । valmīkaśca sumeruḥ kṛtapratijñasya vīrasya ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि युवा शक्ति ही राष्ट्र-निर्माण की सबसे सशक्त आधारशिला है। भारतीय युवा अपने जोश और जुनून से हर संकल्प को साकार कर सकते हैं।

अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः का अर्थ

दृढप्रतिज्ञ वीर पुरुष के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी आँगन के समान, सागर बावली के समान तथा दुर्गम पर्वत भी दीमकों के बनाए मिट्टी के टीले के समान होता है, अर्थात् दृढप्रतिज्ञ वीर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं।

शब्दार्थ

अङ्गणवेदीaṅgaṇavedī

आँगन की वेदी

अङ्गण + वेदी

वसुधाvasudhā

पृथ्वी

वसु + √धा

कुल्याkulyā

छोटी नहर

कुल्या

जलधिःjaladhiḥ

समुद्र

जल + √धा

स्थलीsthalī

समतल भूमि

√स्था

चca

और

पातालम्pātālam

पाताल

पाताल

वल्मीकःvalmīkaḥ

बाँबी

वल्मीक

सुमेरुःsumeruḥ

सुमेरु पर्वत

सु + मेरु

कृतप्रतिज्ञस्यkṛtapratijñasya

प्रतिज्ञा कर चुके

√कृ + प्रति + √ज्ञा

वीरस्यvīrasya

वीर के लिए

वीर

व्याख्या

बाणभट्ट रचित 'हर्षचरित' के सातवें अध्याय का यह प्रथम श्लोक राजा हर्ष के विश्व-विजय अभियान के संकल्प को रेखांकित करता है। यह उस व्यक्ति की अदम्य भावना का उत्सव मनाता है जिसने दृढ़ संकल्प (कृतप्रतिज्ञ) कर लिया है। हालांकि अपनी शैली के कारण इसे अक्सर भर्तृहरि के 'नीति शतकम्' का हिस्सा मान लिया जाता है, लेकिन इसकी मूल उत्पत्ति बाणभट्ट के गद्य काव्य में है। एक दृढ़निश्चयी वीर के लिए दुनिया के विशाल भौतिक आयाम उसकी इच्छाशक्ति के सामने छोटे पड़ जाते हैं। विशाल पृथ्वी उसके लिए आँगन की वेदी बन जाती है, गहरा समुद्र एक छोटी कुल्या (नहर) बन जाता है, पाताल रहने योग्य ठोस स्थल बन जाता है और विशाल सुमेरु पर्वत दीमक का टीला (वल्मीक) प्रतीत होता है। यह सिखाता है कि बाधाओं का आकार हमारे संकल्प की दृढ़ता पर निर्भर करता है।

मूल पोस्ट

पोस्ट लोड हो रहा है...

साहस पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस