वाग्बुद्धिचित्तकरणैश्च - अमरनाथ की शरण

3 जुल॰ 2026

वाग्बुद्धिचित्तकरणैश्च तपोभिरुग्रैः शक्यं समाकलयितुं न यदीयरूपम्। तं भक्तिभावसुलभं शरणं नतानां नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम्॥

vāgbuddhicittakaraṇaiś ca tapobhir ugraiḥ śakyaṃ samākalayituṃ na yadīyarūpam । taṃ bhaktibhāvasulabhaṃ śaraṇaṃ natānāṃ nityaṃ bhajāmy amaranātham ahaṃ dayālum ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

समस्त शिवभक्तों को पावन-पुनीत श्री अमरनाथ यात्रा के शुभारंभ की अनंत शुभकामनाएं! बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन की यह यात्रा आप सभी के जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और उत्तम स्वास्थ्य लेकर आए। जय बाबा बर्फानी!

वाग्बुद्धिचित्तकरणैश्च तपोभिरुग्रैः शक्यं का अर्थ

जिनके स्वरूप को वाणी, बुद्धि, चित्त और इन्द्रियों के द्वारा, यहाँ तक कि कठोर तपस्याओं से भी नहीं जाना जा सकता, जो भक्तिभाव से सहज ही प्राप्त हो जाते हैं और जो नतमस्तक भक्तों के आश्रय हैं, उन दयालु भगवान् अमरनाथ की मैं नित्य आराधना करता हूँ।

शब्दार्थ

वाग्बुद्धिचित्तकरणैःvāgbuddhicittakaraṇaiḥ

वाणी, बुद्धि, चित्त और इन्द्रियों से

वाच् + √बुध् + √चित् + करण

च तपोभिः उग्रैःca tapobhir ugraiḥ

और उग्र तपों से

√तप्

शक्यम्śakyam

सम्भव

√शक्

समाकलयितुम्samākalayitum

पूर्णतः जान लेना

सम् + आ + √कल्

नna

नहीं

यदीयरूपम्yadīyarūpam

जिनका स्वरूप

यद् + रूप

तम्tam

उन्हें

तद्

भक्तिभावसुलभम्bhaktibhāvasulabham

भक्तिभाव से सुलभ

√भज् + भाव + सु + √लभ्

शरणम् नतानाम्śaraṇaṁ natānām

नत जनों की शरण

√शृ + √नम्

नित्यम् भजामिnityaṁ bhajāmi

मैं नित्य भजता हूँ

√भज्

अमरनाथम्amaranātham

अमरों के नाथ को

अ + √मृ + नाथ

अहम्aham

मैं

दयालुम्dayālum

दयालु अमरनाथ को

दया

व्याख्या

यह श्लोक भगवान अमरनाथ को एक साथ अतीन्द्रिय और भक्तों के लिए अत्यंत सुलभ रूप में प्रस्तुत करता है। वाणी, बुद्धि, चित्त, इन्द्रियाँ और कठोर तप भी उनके वास्तविक स्वरूप को पूर्णतः नहीं जान सकते। यह सीमा महत्वपूर्ण है: ईश्वर को केवल तर्क, चतुराई या साधना की कठोरता से पूरी तरह पकड़ लेने योग्य वस्तु नहीं माना गया है। फिर भी वही प्रभु 'भक्तिभावसुलभ' हैं, अर्थात सच्चे भक्तिभाव से सहज प्राप्त होते हैं, और 'नतानां शरणम्' हैं, यानी विनम्र होकर झुकने वालों के आश्रय हैं। इस प्रकार श्लोक विस्मय और आत्मीयता दोनों को साथ रखता है। यह भक्त को साधारण ज्ञान की सीमा समझने और समर्पण, श्रद्धा तथा नित्य आराधना की शक्ति पर भरोसा रखने की प्रेरणा देता है। अमरनाथ यात्रा के संदर्भ में यह केवल पवित्र स्थान की यात्रा नहीं, बल्कि मन को विनम्र, आस्था को स्थिर और जीवन को सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य तथा कृपा से पूर्ण करने की प्रार्थना बन जाता है।

मूल पोस्ट

पोस्ट लोड हो रहा है...

भक्ति पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य