व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर् - ज्ञान का प्रकाश

16 अप्रैल 2026

व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम्। ता त्वामुषर्वसूयवो गीर्भिः कण्वा अहूषत॥

vyucchantī hi raśmibhir viśvam ābhāsi rocanam । tā tvām uṣar vasūyavo gīrbhiḥ kaṇvā ahūṣata ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आज से शुरू हो रही संसद की विशेष बैठक में हमारा देश नारी सशक्तिकरण के लिए ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। हमारी माताओं-बहनों का सम्मान राष्ट्र का सम्मान है और यही भावना लेकर हम इस दिशा में दृढ़ता से आगे बढ़ रहे हैं।

व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम् का अर्थ

नारी अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान के अंधकार को दूर कर पूरे विश्व को आलोकित करती है। इसलिए समृद्धि और सद्गुणों की कामना करने वाले मनुष्य सदैव नारी का सम्मान करते हैं।

शब्दार्थ

व्युच्छन्तीvyucchantī

रात्रि हटाती हुई

वि + √वस्

हि रश्मिभिःhi raśmibhiḥ

अपनी किरणों से

रश्मि

विश्वम्viśvam

समस्त विश्व को

विश्व

आभासिābhāsi

प्रकाशित करती हो

आ + √भा

रोचनम्rocanam

दीप्तिमय लोक

√रुच्

ताः त्वाम्tā tvām

उन्हीं तुम्हें

उषःuṣaḥ

हे उषा

√वस्

वसूयवःvasūyavaḥ

धन की कामना करते हुए

वसु

गीर्भिःgīrbhiḥ

स्तुतियों से

गिर्

कण्वाःkaṇvāḥ

कण्व ऋषिगण

अहूषतahūṣata

पुकारा है

√हू

व्याख्या

ऋग्वेद का यह मन्त्र उषा, अर्थात् भोर, को सम्बोधित करता है। वह अपनी किरणों से सम्पूर्ण दीप्त लोक को प्रकाशित करती है और धन की कामना रखने वाले कण्व उसे स्तुतियों से पुकारते हैं। मन्त्र किसी सामान्य स्त्री, अज्ञान-नाश, नारी-सम्मान या श्रेष्ठ नारी-गुणों की बात नहीं करता। संग्रहीत अर्थ उषा के स्त्रीरूप मानवीकरण से आधुनिक महिला-सशक्तीकरण की ओर बढ़ता है; यह पोस्ट के प्रसंग में अर्थवान् अनुप्रयोग हो सकता है, पर मन्त्र का अनुवाद नहीं।

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ऋग्वेद से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
27 अग॰ 2026
ऋग्वेद

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।

विद्याकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता

नारीशक्ति पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति