अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः - सार का ग्रहण

20 जन॰ 2026

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥

anantaśāstraṃ bahulāśca vidyāḥ alpaśca kālo bahuvighnatā ca । yatsārabhūtaṃ tadupāsanīyaṃ haṃso yathā kṣīramivāmbumadhyāt ॥

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च का अर्थ

ज्ञान प्राप्ति के लिए शास्त्र अनेक हैं और विद्याएँ भी बहुत हैं, परंतु समय सीमित है और विघ्न-बाधाएँ भी अनेक हैं। अतः, जैसे हंस जल और दूध के मिश्रण में से केवल दूध ही अलग निकाल लेता है, वैसे ही मनुष्य को भी केवल सार-सर्वस्व को ही ग्रहण करना चाहिए।

शब्दार्थ

अनन्तशास्त्रम्anantaśāstram

शास्त्र अनन्त हैं

अन् + अन्त + शास्त्र

बहुलाःbahulāḥ

बहुत

बहुल

चca

और

विद्याःvidyāḥ

विद्याएँ

√विद्

अल्पःalpaḥ

अल्प

अल्प

कालःkālaḥ

समय

काल

बहुविघ्नताbahuvighnatā

अनेक विघ्न

बहु + वि + √हन्

यत् सारभूतम्yat sārabhūtam

जो सारभूत है

सार + √भू

तत्tat

उसी की

तद्

उपासनीयम्upāsanīyam

उपासना करनी चाहिए

उप + √आस्

हंसःhaṁsaḥ

हंस

हंस

यथाyathā

जैसे

क्षीरम्kṣīram

दूध

क्षीर

अम्बुमध्यात्ambumadhyāt

जल के मध्य से

अम्बु + मध्य

व्याख्या

यह कालजयी श्लोक 'नीर-क्षीर विवेक'—दूध और पानी को अलग करने वाले हंस के विवेक—के माध्यम से एक महान संदेश देता है। सूचनाओं और शास्त्रों के इस सागर में, जहाँ विद्याएँ अनंत हैं और मानवीय समय बहुत कम, यह श्लोक हमें प्राथमिकताएँ तय करने की प्रेरणा देता है। सच्ची विद्वत्ता सब कुछ रटने में नहीं, बल्कि 'सारभूत' यानी जो अत्यंत आवश्यक और सत्य है, उसे पहचानने में है। यह हमें सिखाता है कि जीवन की सार्थकता अनावश्यक विस्तार में खो जाने के बजाय सत्य के मूल तत्व को आत्मसात करने में निहित है। प्रथम पंक्ति चार बाधाएँ रखती है, और वे दो प्रकार की हैं: दो आधिक्य की—अनन्त शास्त्र, बहुल विद्याएँ—और दो अभाव की, अल्प काल तथा बहुविघ्नता। अतः कठिनाई अज्ञान के रूप में नहीं, असंगति के रूप में रखी गई है, और हंस उसी असंगति का उत्तर है। उसकी विशेषता अधिक जानना नहीं, केवल क्षीर ग्रहण करना है—और यह जितनी विवेक की कुशलता है, उतनी ही त्याग की।

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चाणक्य नीति से और सुभाषित

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17 जुल॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।

ज्ञानअनुशासनदृढ़ता
18 मई 2026
चाणक्य नीति

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।

दृढ़ताविद्याधर्मसमृद्धिअनुशासन
14 मई 2026
चाणक्य नीति

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥

यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।

विद्याशिक्षासम्मान

ज्ञान पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

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