विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
प्रधानमंत्री का संदेशविद्या जीवन की ऐसी पूंजी है, जिससे बड़े से बड़े लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। विद्या हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर सफलता और आत्मविश्वास की ओर ले जाती है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् का अर्थ
विद्वान व्यक्ति की संसार में प्रशंसा होती है और उसे सर्वत्र सम्मान प्राप्त होता है। विद्या के माध्यम से मनुष्य जीवन की समस्त आवश्यक वस्तुएँ और उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है, अतः विद्या सर्वत्र पूजनीय मानी जाती है।
शब्दार्थ
- विद्वान्vidvān
विद्वान्
√विद्
- प्रशस्यतेpraśasyate
प्रशंसित होता है
प्र + √शंस्
- लोकेloke
संसार में
लोक
- सर्वत्रsarvatra
सर्वत्र
सर्व
- गौरवम्gauravam
गौरव
गुरु
- विद्ययाvidyayā
विद्या से
√विद्
- लभतेlabhate
प्राप्त करता है
√लभ्
- सर्वम्sarvam
सब कुछ
सर्व
- विद्याvidyā
विद्या
√विद्
- पूज्यतेpūjyate
पूजी जाती है
√पूज्
व्याख्या
चाणक्य नीति का यह श्लोक दो परस्पर जुड़े सत्य प्रतिपादित करता है: प्रथमतः, विद्वान व्यक्ति को सर्वत्र मान-सम्मान मिलता है; और द्वितीयतः, विद्या के माध्यम से मनुष्य जीवन में सब कुछ प्राप्त कर सकता है। यह श्लोक विद्या को सबसे बड़ी पूँजी के रूप में स्थापित करता है। धन चोरी हो सकता है, सत्ता छिन सकती है, किंतु ज्ञान ऐसी संपत्ति है जो जीवनपर्यंत साथ रहती है और उपयोग से और भी बढ़ती है। यह अवसरों के द्वार खोलता है, गरिमा प्रदान करता है और व्यक्ति को आत्मविश्वास से जीवन जीने में सक्षम बनाता है। दोनों पंक्तियों में 'सर्वत्र' शब्द की पुनरावृत्ति इस सिद्धांत की सार्वभौमिकता को रेखांकित करती है — ज्ञान का सम्मान भूगोल, वर्ग और परिस्थिति से परे है। यही कारण है कि विद्या केवल उपयोगी नहीं, 'पूजनीय' है।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥
yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥
जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।