यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
yathāśakti cikīrṣanti yathāśakti ca kurvate । na kiñcidavamanyante narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदेशवासियों के इन्हीं गुणों से भारत आज अपने सामर्थ्य को निरंतर बढ़ा रहा है…
यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च का अर्थ
बुद्धिमान व्यक्ति अपने विवेक, शक्ति और सामर्थ्य पर पूर्ण विश्वास रखते हुए ही किसी कार्य का निश्चय करते हैं। वे न किसी की बातों से विचलित होते हैं और न ही दूसरों को हीन दृष्टि से देखते हैं। वास्तव में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुरूप कर्म करना ही 'ज्ञानी' व्यक्ति का वास्तविक लक्षण है।
शब्दार्थ
- यथाशक्तिyathāśakti
सामर्थ्य के अनुसार
यथा + शक्ति
- चिकीर्षन्तिcikīrṣanti
करने की इच्छा करते हैं
√कृ
सन्नन्त रूप—इच्छा ही सामर्थ्य से नापी जाती है।
- चca
और
- कुर्वतेkurvate
करते हैं
√कृ
- न किञ्चित्na kiñcit
किसी को नहीं
- अवमन्यन्तेavamanyante
तुच्छ समझते
अव + √मन्
- नराःnarāḥ
मनुष्य
नर
- पण्डितबुद्धयःpaṇḍitabuddhayaḥ
पण्डित बुद्धि वाले
पण्डा + √बुध्
व्याख्या
विदुर नीति का यह श्लोक विवेकशील लोगों की तीन जुड़ी आदतें बताता है। वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार कार्य करने की इच्छा करते हैं, उसी सीमा में कार्य करते हैं और किसी बात को तुच्छ नहीं मानते। सन्नन्त 'चिकीर्षन्ति' से इच्छा भी उपलब्ध शक्ति के अनुरूप मापी जाती है और 'कुर्वते' उस माप को कर्म में ले जाता है। संग्रहीत अर्थ में शब्दों, लोगों और अन्य ठोस बातों का उल्लेख अन्तिम 'न किञ्चिदवमन्यन्ते' के उदाहरण हैं, संस्कृत में अलग से आए पद नहीं। सामूहिक प्रयास पर इसका अनुप्रयोग उचित है, यदि उदाहरणों को शाब्दिक अनुवाद न माना जाए।
मूल पोस्ट
विदुर नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।