एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता। न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या विना शिवः॥
evaṁ parasparāpekṣā śaktiśaktimatoḥ sthitā । na śivena vinā śaktirna śaktyā vinā śivaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेश1998 में इसी दिन भारत ने जो परमाणु परीक्षण किए थे, उनसे दुनिया को पता चला कि हमारे देश की इच्छाशक्ति कितनी अटल है! 11 मई के टेस्ट के बाद पूरी दुनिया का दबाव भारत पर था, लेकिन हमने दिखाया कि कोई भी ताकत भारत को झुका नहीं सकती।
एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता का अर्थ
शक्ति और सामर्थ्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। केवल क्षमता होना पर्याप्त नहीं, उसे कार्यरूप देने वाली शक्ति भी आवश्यक है; और शक्ति भी तभी सार्थक होती है जब उसके पीछे समर्थ आधार हो। जैसे शिव और शक्ति का अस्तित्व परस्पर अविभाज्य माना गया है, वैसे ही सामर्थ्य और ऊर्जा के समन्वय से ही सृजन, प्रगति और सफलता संभव होती है।
शब्दार्थ
- एवम्evam
इस प्रकार
- परस्परापेक्षाparasparāpekṣā
पारस्परिक अपेक्षा
परस्पर + अपेक्षा
- शक्तिशक्तिमतोःśaktiśaktimatoḥ
शक्ति और शक्तिमान् की
शक्ति + शक्तिमत्
- स्थिताsthitā
स्थित है
√स्था
- न शिवेन विनाna śivena vinā
शिव के बिना नहीं
शिव
- शक्तिःśaktiḥ
शक्ति
√शक्
- न शक्त्या विनाna śaktyā vinā
शक्ति के बिना नहीं
शक्ति
- शिवःśivaḥ
शिव
शिव
व्याख्या
यह श्लोक शाक्त-शैव दर्शन के एक मूल सिद्धांत को व्यक्त करता है: शिव (शक्तिमान — शक्ति के अधिष्ठाता) और शक्ति की पूर्ण एवं पारस्परिक अविभाज्यता। दोनों में से कोई भी अकेले अस्तित्ववान नहीं हो सकता — शक्ति के बिना शिव निष्क्रिय क्षमता मात्र है, और शिव के बिना शक्ति के प्रकट होने का कोई आधार नहीं है। भारत के 1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों की वर्षगांठ पर साझा किया गया यह श्लोक एक गहन साम्य उद्घाटित करता है: राष्ट्र की क्षमता (शक्ति) और उसे क्रियान्वित करने की इच्छाशक्ति (शक्तिमान) — दोनों समान रूप से अनिवार्य हैं। भारत ने इस दिन दोनों का प्रदर्शन किया — दशकों में विकसित वैज्ञानिक क्षमता, और वैश्विक दबाव के बावजूद उसे परिनियोजित करने का नैतिक एवं राजनीतिक साहस।
मूल पोस्ट
शिव पुराण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥
prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥
यह संस्कृत सुभाषित सूर्य और उसके प्रकाश के माध्यम से अस्तित्व, शक्ति और अभिव्यक्ति की गहरी परस्पर निर्भरता को समझाता है।
शक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।