शीलं परहितासक्तिः - विद्या के उज्ज्वल फल

21 अप्रैल 2026

शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः। अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्॥

śīlaṁ parahitāsaktiḥ anutsekaḥ kṣamā dhṛtiḥ । alobhaśceti vidyāyāḥ paripākojjvalaṁ phalam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

राष्ट्रसेवा ही ‘विकसित भारत’ की नींव है। सिविल सेवा दिवस के गौरवशाली अवसर पर आइए, अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को विकास की मुख्यधारा से जोड़कर सशक्त, समृद्ध एवं संवेदनशील भारतवर्ष के निर्माण का संकल्प दोहराएं।

शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा का अर्थ

शील, परोपकार, विनय, क्षमा, धैर्य और अलोभ ये सभी विद्या की पूर्णता के उज्ज्वल फल हैं।

शब्दार्थ

शीलम्śīlam

शील

शील

परहितासक्तिःparahitāsaktiḥ

परहित में लगाव

पर + हित + आ + √सञ्ज्

अनुत्सेकःanutsekaḥ

अनुत्सेक, निरभिमानता

अन् + उद् + √सिच्

क्षमाkṣamā

क्षमा

√क्षम्

धृतिःdhṛtiḥ

धृति

√धृ

अलोभःalobhaḥ

अलोभ

अ + √लुभ्

च इतिceti

और इस प्रकार

विद्यायाःvidyāyāḥ

विद्या का

√विद्

परिपाकोज्ज्वलम्paripākojjvalam

परिपक्वता से उज्ज्वल

परि + √पच् + उद् + √ज्वल्

फलम्phalam

फल

फल

व्याख्या

यह सुभाषित वास्तविक शिक्षा को केवल सूचनाओं के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि चरित्र के निर्माण के रूप में परिभाषित करता है। इसमें छह आवश्यक गुणों की सूची दी गई है: शील (सदाचार), परहितासक्ति (परोपकार), अनुत्सेक (अहंकार का अभाव), क्षमा, धृति (धैर्य) और अलोभ (लालच न करना)। श्लोक के अनुसार, ये 'विद्या' के 'परिपाक' यानी पूर्ण रूप से पके हुए 'उज्ज्वल' फल हैं। यदि विद्या से इन नैतिक गुणों का विकास नहीं होता, तो वह अधूरी रहती है। लोक सेवा के संदर्भ में, ये गुण एक ऐसे संवेदनशील नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए समर्पित है।

मूल पोस्ट

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दर्पदलनम् से और सुभाषित

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23 जन॰ 2026
दर्पदलनम्

एतदेव परं शौर्यं यत् परप्राणरक्षणम्। नहि प्राणहरः शूरः शूरः प्राणप्रदोऽर्थिनाम्॥

etadeva paraṁ śauryaṁ yat paraprāṇarakṣaṇam । nahi prāṇaharaḥ śūraḥ śūraḥ prāṇaprado'rthinām ॥

सच्ची वीरता प्राण लेने में नहीं, बल्कि प्राणों की रक्षा करने में है। यह श्लोक एक सच्चे वीर को संकट में पड़े लोगों को जीवन देने वाले के रूप में परिभाषित करता है।

साहसनैतिकताधर्मचरित्र

चरित्र पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य