यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा। पृथिवीं धेनुं प्रदुहां न उदिच्छन्तु नमोऽस्तु पृथिव्यै॥
yasyāṃ vṛkṣā vānaspatyā dhruvāstiṣṭhanti viśvahā । pṛthivīṃ dhenuṃ praduhāṃ na udicchantu namo’stu pṛthivyai ॥
प्रधानमंत्री का संदेशपृथ्वी हमारी माता है और इसके संरक्षण में मानवता का कल्याण निहित है। इसकी रक्षा करना हम सबका केवल दायित्व नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा पवित्र संकल्प भी है।
यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति का अर्थ
जिस भूमि पर वृक्ष और वनस्पतियां सदैव अडिग और स्थिर खड़ी रहती हैं, वह पृथ्वी हमारे लिए समस्त सुखों और संसाधनों को प्रदान करे। हम उस माता पृथ्वी को नमन करते हैं।
शब्दार्थ
- यस्याम्yasyām
जिस पर
यद्
- वृक्षाःvṛkṣāḥ
वृक्ष
वृक्ष
- वानस्पत्याःvānaspatyāḥ
वनस्पति जाति के
वनस्पति
- ध्रुवाःdhruvāḥ
स्थिर
√ध्रु
- तिष्ठन्तिtiṣṭhanti
खड़े रहते हैं
√स्था
- विश्वहाviśvahā
सर्वदा
विश्व
- पृथिवीम् धेनुम्pṛthivīṁ dhenum
पृथ्वी को धेनु रूप में
√प्रथ् + √धे
- प्रदुहाम्praduhām
दुहें
प्र + √दुह्
- नः उदिच्छन्तुna udicchantu
हमारे लिए उठें
उद् + √इष्
- नमः अस्तु पृथिव्यैnamo'stu pṛthivyai
पृथ्वी को नमस्कार
√नम्
व्याख्या
यह मंत्र अथर्ववेद के प्रसिद्ध 'भूमि सूक्त' का हिस्सा है। यह प्राकृतिक जगत की स्थिरता—सदा अडिग रहने वाले वृक्षों और वनस्पतियों—को स्वीकार करता है और पृथ्वी से एक 'धेनु' (गाय) की भांति समस्त सुखों और संसाधनों की कामना करता है। यह वैदिक परंपरा की गहरी पारिस्थितिक चेतना को दर्शाता है, जहाँ पृथ्वी को दोहन की वस्तु नहीं, बल्कि पूजनीय और संरक्षण योग्य माता माना गया है। यह प्राचीन ज्ञान हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा करना केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण के लिए एक पवित्र संकल्प है। श्लोक दो भावों को बिना किसी एक को चुने साथ रखता है। पृथ्वी से दुधारू गाय की भाँति देने की प्रार्थना है—'धेनुं प्रदुहाम्'—और उसी साँस में उसे नमस्कार भी है, 'नमोऽस्तु पृथिव्यै'। भूमिसूक्त आद्यन्त पृथ्वी के उपयोग और उसके प्रति श्रद्धा के बीच विभाजन को अस्वीकार करता है, और दूसरे को पहले का विरोधी नहीं, उसकी शर्त मानता है। 'विश्वहा' अर्थात् सर्वदा, कालमान निर्धारित करता है: वृक्ष किसी ऋतु में नहीं, सदा स्थिर खड़े रहते हैं।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।