यस्येमे हिमवन्तो महित्वा - राष्ट्र की महिमा

11 फ़र॰ 2026

यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः। यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ । yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

सर्वस्व समर्पण उस चेतना की अभिव्यक्ति है, जिसमें राष्ट्र और मानवता सर्वोपरि होती है। अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी इसी भावना से देश के जन-जन को सशक्त बनाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य का अर्थ

जिस राष्ट्र की महिमा का गान हिमालय करता है, जिसकी कीर्ति नदियों के साथ समुद्र तक प्रवाहित होती है और जिसकी भुजाओं के समान दिशाएँ उसे नमन करती हैं, उस राष्ट्र को हम अपना सर्वस्व समर्पित करें।

शब्दार्थ

यस्य इमेyasyeme

जिसके ये

यद्

हिमवन्तःhimavantaḥ

हिमालय

हिम

महित्वाmahitvā

महिमा से

महत्

यस्य समुद्रम्yasya samudram

जिसका समुद्र

समुद्र

रसया सहrasayā saha

रसा सहित

रसा

आहुःāhuḥ

कहते हैं

√अह्

यस्य इमाः प्रदिशःyasyemāḥ pradiśaḥ

जिसकी ये दिशाएँ

प्र + √दिश्

यस्य बाहूyasya bāhū

जिसकी दोनों भुजाएँ

बाहु

कस्मै देवायkasmai devāya

किस देव को

किम् + देव

हविषा विधेमhaviṣā vidhema

हवि से पूजें

√हु + वि + √धा

व्याख्या

ऋग्वेद के हिरण्यगर्भ सूक्त का यह श्लोक उस दिव्य शक्ति के प्रति एक उदात्त श्रद्धांजलि है जो विश्व के भौतिक वैभव के रूप में प्रकट होती है। यहाँ इसका राष्ट्र-समर्पण के संदर्भ में अर्थ लिया गया है, मूल रूप से यह उस सृष्टिकर्ता की स्तुति करता है जिसकी महिमा हिमालय की बर्फीली चोटियों, महासागरों की विशालता और सभी दिशाओं के विस्तार में झलकती है। यह हमें अपने भूगोल में दिव्यता देखने और अपनी भूमि के प्रति 'हविषा विधेम'—निस्वार्थ अर्पण के माध्यम से उपासना—के भाव से आगे बढ़ने की शिक्षा देता है। यह चेतना के विस्तार का आह्वान करता है जहाँ व्यक्ति की पहचान राष्ट्र और मानवता के व्यापक हित में विलीन हो जाती है।

मूल पोस्ट

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ऋग्वेद से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
27 अग॰ 2026
ऋग्वेद

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।

विद्याकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता

भक्ति पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

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