पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥
puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् का अर्थ
जिस तरह समीप रहते हुए फल और फूलों वाले वृक्ष, मनुष्यों को तृप्त करते हैं, उसी तरह वृक्ष दूर रहकर भी वृक्षारोपण करने वाले मनुष्य को सभी प्रकार के लाभप्रदान किया करते हैं।
शब्दार्थ
- पुष्पिताःpuṣpitāḥ
पुष्पित
√पुष्प्
- फलवन्तःphalavantaḥ
फलयुक्त
फल
- चca
और
- तर्पयन्तिtarpayanti
तृप्त करते हैं
√तृप्
- इहiha
इस लोक में
- मानवान्mānavān
मनुष्यों को
मनु
- वृक्षदम्vṛkṣadam
वृक्ष लगाने वाले को
वृक्ष + √दा
- पुत्रवत्putravat
पुत्रों के समान
पुत्र
- वृक्षाःvṛkṣāḥ
वृक्ष
वृक्ष
- तारयन्तिtārayanti
तारते हैं
√तॄ
- परत्रparatra
परलोक में
पर
'परत्र' अर्थात् परलोक—'दूर से' नहीं।
व्याख्या
महाभारत का यह सुंदर श्लोक वृक्षारोपण की तुलना संतान पालन से करता है। यह सुझाव देता है कि जिस प्रकार बच्चे अपने माता-पिता के लिए खुशी और सहारा लाते हैं, उसी प्रकार वृक्ष मानवता को पोषण और संतोष प्रदान करते हैं। इसमें आध्यात्मिक आयाम जोड़ते हुए कहा गया है कि वृक्ष परलोक में भी रोपणकर्ता का 'उद्धार' या लाभ करते हैं, जो पर्यावरण की देखभाल और प्रकृति के प्रति निस्वार्थ सेवा के दीर्घकालिक कर्म फल पर जोर देता है। साझा अर्थ में 'परत्र' को 'दूर रहकर' पढ़ा गया है, जबकि इसका अर्थ 'परलोक में' है। श्लोक कहता है कि लगाए गए वृक्ष पुत्रों के समान (पुत्रवत्) वृक्षारोपक को परलोक में तारते हैं—पुण्य के इसी हस्तांतरण पर पंक्ति का पूरा बल है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
निःस्वार्थ सेवा पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंभस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।