धर्मो यशो नयो दाक्ष्यम् मनोहारि सुभाषितम्। इत्यादिगुणरत्नानां संग्रहीनावसीदति॥
dharmaḥ yaśo nayaḥ dākṣyam manohāri subhāṣitam । ityādi guṇaratnānāṁ saṅgrahīnāvasīdati ॥
धर्मो यशो नयो दाक्ष्यम् का अर्थ
धर्म, यश, नीति, दक्षता, चित्त को मोहित करने वाली मधुर वाणी जैसे उत्तम गुणों का संग्रह करनेवाला व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होता।
शब्दार्थ
- धर्मःdharmaḥ
धर्म
√धृ
- यशःyaśaḥ
यश
यशस्
- नयःnayaḥ
नीति
√नी
- दाक्ष्यम्dākṣyam
दक्षता
दक्ष
- मनोहारिmanohāri
मनोहर
मनस् + √हृ
- सुभाषितम्subhāṣitam
सुभाषित
सु + √भाष्
- इत्यादिityādi
इत्यादि
इति + आदि
- गुणरत्नानाम्guṇaratnānām
गुणरूपी रत्नों का
गुण + रत्न
- सङ्ग्रहीsaṅgrahī
संग्रह करने वाला
सम् + √ग्रह्
- न अवसीदतिnāvasīdati
धँसता नहीं
अव + √सद्
व्याख्या
यह श्लोक उन गुणों को एकत्र करता है जो व्यक्ति को भीतर से स्थिर और समाज में विश्वसनीय बनाते हैं। दिए गए हिन्दी अर्थ में 'यश' ठीक बना हुआ है; अंग्रेज़ी अर्थ में इसके स्थान पर 'truthful' आया है, जो संस्कृत से भिन्न है। धर्म नैतिक आधार देता है, यश सम्मानित प्रतिष्ठा है, नय उचित विवेक या नीति है और दाक्ष्य व्यावहारिक कुशलता है। ‘मनोहारी सुभाषित’ ऐसी वाणी जोड़ता है जो मधुर होने के साथ सार्थक भी हो, अर्थात चरित्र अभिव्यक्ति में भी संवेदनशील रहे। इन गुणों को ‘गुणरत्न’ कहा गया है। उनका मूल्य केवल छवि सजाने में नहीं, बल्कि कठिनाई का सामना करते समय व्यक्ति को असहाय विषाद में गिरने से बचाने में है। श्लोक जो वचन देता है वह सन्तोष से अधिक सीमित और अधिक दृढ़ है। 'अवसीदति' का अर्थ है डूबना या बैठ जाना—अतः इन गुणरत्नों का संग्रही 'नहीं धँसता' कहा गया है; चित्र भार के नीचे अपनी संरचना बनाए रखने वाली वस्तु का है, प्रसन्न अनुभव करते व्यक्ति का नहीं। पाँच नामित गुण भी एक-एक क्षेत्र से लिए गए हैं: धर्म आन्तरिक, यश सामाजिक, नय और दाक्ष्य व्यावहारिक, और सुभाषित वह अभिव्यक्ति-रूप जिसे धारण किए बिना शेष उपयोगी नहीं होते।
स्रोत और पाठभेद
यह श्लोक यहाँ भी उपलब्ध है
मूल पोस्ट
सुभाषितरत्नाकर से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।