अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः - संकलित छोटे कार्य बड़ी सफलता

17 दिस॰ 2025

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥

alpanām api vastūnāṁ saṃhatiḥ kārya-sādhikā । tṛṇair guṇatvam āpannair badhyante mattadantinaḥ ॥

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका का अर्थ

अनेक छोटी-छोटी वस्तुओं को सही ढंग से एक साथ लाने से बड़े काम भी हो सकते हैं, जैसे घास के ढेर से बनाई रस्सियों से उन्मत्त हाथियों को भी बांधा जा सकता है।

शब्दार्थ

अल्पानाम्alpānām

छोटी वस्तुओं का

अल्प

अपिapi

भी

वस्तूनाम्vastūnām

वस्तुओं का

√वस्

संहतिःsaṁhatiḥ

संहति, मेल

सम् + √हन्

कार्यसाधिकाkāryasādhikā

कार्य सिद्ध करने वाली

√कृ + √साध्

तृणैःtṛṇaiḥ

तृणों से

तृण

गुणत्वम्guṇatvam

गुणत्व, धागा-रूप

गुण

'गुण' अर्थात् धागा और योग्यता—दोनों अर्थ यहाँ सक्रिय हैं।

आपन्नैःāpannaiḥ

प्राप्त हुए

आ + √पद्

बध्यन्तेbadhyante

बाँधे जाते हैं

√बन्ध्

मत्तदन्तिनःmattadantinaḥ

मदमत्त हाथी

मत्त + दन्तिन्

व्याख्या

हितोपदेश का यह प्रसिद्ध सुभाषित एकता की शक्ति को समझाने के लिए एक जीवंत रूपक का उपयोग करता है। घास का एक तिनका नाजुक होता है और आसानी से टूट जाता है, लेकिन जब ऐसे कई तिनकों को एक साथ रस्सी में पिरोया जाता है, तो वे एक शक्तिशाली, मदमस्त हाथी को भी बांधने की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यह सिखाता है कि सामूहिक प्रयास और संगठन उन लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं जो अकेले कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए असंभव हैं, इस बात पर जोर देते हुए कि एकीकृत होने पर कोई भी योगदान छोटा नहीं होता है। दूसरी पंक्ति एक श्लेष पर घूमती है जिसे चित्र छिपा लेता है: 'गुण' का अर्थ रस्सी का धागा भी है और गुण अर्थात् योग्यता भी—अतः जो तृण 'गुणत्व' को प्राप्त हुए हैं, वे एक ही शब्द में धागा भी बन गए और योग्यता भी पा गए। इसका स्थान भी अर्थ जोड़ता है: 'मित्रलाभ' हितोपदेश का वह तन्त्र है जो मैत्री अर्जित करने पर है, अतः रस्सी केवल एकता का दृष्टान्त नहीं, उसे खोजने का तर्क है।

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हितोपदेश से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

एकता पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा