नीतिशतकम् से सुभाषित

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नवीनतम अद्यतन: 1 अक्टू॰ 2026

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1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
7 जुल॰ 2026
नीतिशतकम्

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥

bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥

नीतिशतकम् का यह श्लोक फलयुक्त वृक्षों और जलभरे मेघों के माध्यम से बताता है कि सज्जन समृद्धि में और विनम्र हो जाते हैं।

विनम्रतानिःस्वार्थ सेवाचरित्रप्रकृति
6 जुल॰ 2026
नीतिशतकम्

जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः। नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम्॥

jayanti te sukṛtino rasasiddhāḥ kavīśvarāḥ । nāsti yeṣāṃ yaśaḥkāye jarāmaraṇajaṃ bhayam ॥

भर्तृहरि के नीतिशतकम् का यह श्लोक रससिद्ध कवीश्वरों के उस यश की बात करता है जो जरा और मृत्यु से परे है।

विद्यासम्मान
23 अप्रैल 2026
नीतिशतकम्

पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥

padmākaraṁ dinakaro vikacīkaroti candro vikāsayati kairavacakravālam । nābhyarthito jaladharo’pi jalaṁ dadāti santaḥ svayaṁ parahiteṣu kṛtābhiyogāḥ ॥

सूर्य, चन्द्र और मेघों के उदाहरण से यह श्लोक बताता है कि सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ या प्रार्थना के दूसरों का भला करते हैं।

निःस्वार्थ सेवाप्रकृतिनैतिकता
18 मार्च 2026
नीतिशतकम्

एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्। क्रियते भास्करेणेव स्फारस्फुरिततेजसा॥

ekenāpi hi śūreṇa pādākrāntaṃ mahītalam । kriyate bhāskareṇeva sphārasphuritetejasā ॥

जैसे सूर्य अकेले ही अपने तेज से समस्त पृथ्वी को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक सच्चा वीर अकेले अपने साहस से पूरी धरती पर अपना प्रभाव स्थापित कर सकता है।

साहसआत्मविश्वासवैयक्तिकताशक्ति