सुवर्ण-रौप्य-माणिक्य-वसनैरपि पूरिताः। तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्ततृष्णया॥
suvarṇa-raupya-māṇikya-vasanair api pūritāḥ । tathāpi prārthayanti eva kṛṣakān bhaktatṛṣṇayā ॥
सुवर्ण-रौप्य-माणिक्य-वसनैरपि पूरिताः का अर्थ
सोना, चांदी, माणिक्य एवं वस्त्रों से पूर्ण होने पर भी मनुष्यों को भोजन के लिए किसानों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
शब्दार्थ
- सुवर्णsuvarṇa
स्वर्ण
सु + वर्ण
- रौप्यraupya
चाँदी
रूप्य
- माणिक्यmāṇikya
माणिक्य
माणिक्य
- वसनैःvasanaiḥ
और वस्त्रों से
√वस्
- अपि पूरिताःapi pūritāḥ
भरे होने पर भी
√पॄ
- तथा अपिtathāpi
फिर भी
- प्रार्थयन्ति एवprārthayanti eva
याचना करते ही हैं
प्र + √अर्थ्
- कृषकान्kṛṣakān
किसानों से
√कृष्
- भक्ततृष्णयाbhaktatṛṣṇayā
अन्न की तृष्णा से
भक्त + √तृष्
'तृष्णा' वही चाह है जिसे धन शान्त नहीं कर सकता।
व्याख्या
यह सुभाषित कृषि के मौलिक महत्व की एक शक्तिशाली याद दिलाता है। यह इस विडंबना की ओर इशारा करता है कि जिनके पास सोने, चांदी और कीमती रत्नों के रूप में अपार धन है, वे भी अपनी सबसे बुनियादी जरूरत: भोजन के लिए अंततः विनम्र किसान पर निर्भर हैं। यह 'कृषक' (किसान) के प्रति गहरे सम्मान का आह्वान करता है और इस बात पर प्रकाश डालता है कि सच्ची समृद्धि केवल धन संचय करने के बारे में नहीं है, बल्कि जीवन का आधार बनने वाले संसाधनों की स्थिरता के बारे में है। व्यंग्य एक ही शब्द उठाए हुए है। 'तृष्णा' वह शब्द है जो प्रायः उस चाह के लिए रखा जाता है जिसे धन शान्त नहीं कर सकता, और यहाँ वह पके हुए अन्न से अधिक किसी उच्च वस्तु से नहीं जुड़ा—'भक्ततृष्णया'। धनवान् ठीक उसी शब्दावली में अभावग्रस्त दिखाए गए हैं जो अतृप्त इच्छा के लिए प्रयुक्त होती है, और जो वे चाहते हैं वही एक वस्तु है जो स्वर्ण बन नहीं सकता। यह कथन बाहर से देखते कवि का नहीं, कृषि के अपने ही साहित्य का है।
मूल पोस्ट
कृषि पाराशर से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंकृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः। अन्नदः सर्वदश्चैव तस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः॥
kṛṣirdhanyā kṛṣirmedhyā jantūnāṁ jīvanaṁ kṛṣiḥ । annadaḥ sarvadaścaiva tasmācchreṣṭhataro hi saḥ ॥
यह श्लोक कृषि को धन देने वाली और सभी जीवों का आधार बताता है। अन्न देने वाला किसान वास्तव में सबसे श्रेष्ठ है।
कृषि पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।