यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
yasya kṛtyaṁ na vighnanti śītamuṣṇaṁ bhayaṁ ratiḥ । samṛddhir asamṛddhir vā sa vai paṇḍita ucyate ॥
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति का अर्थ
सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, संपत्ति अथवा निर्धनता जिनके कार्य में विघ्न नहीं डालते, वह ही ज्ञानी कहलाता है।
शब्दार्थ
- यस्यyasya
जिसके
यद्
- कृत्यम्kṛtyam
कार्य को
√कृ
- न विघ्नन्तिna vighnanti
बाधित नहीं करते
वि + √हन्
- शीतम्śītam
शीत
शीत
- उष्णम्uṣṇam
उष्ण
√उष्
- भयम्bhayam
भय
√भी
- रतिःratiḥ
अनुराग
√रम्
- समृद्धिःsamṛddhiḥ
समृद्धि
सम् + √ऋध्
- असमृद्धिःasamṛddhiḥ
असमृद्धि
अ + सम् + √ऋध्
- वाvā
अथवा
- सः वैsa vai
वही
तद्
- पण्डितःpaṇḍitaḥ
पण्डित
पण्डा
- उच्यतेucyate
कहा जाता है
√वच्
व्याख्या
यह श्लोक एक 'पंडित' या सच्चे विद्वान को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जिसके पास अडिग समभाव है। अपने कर्तव्य के प्रति एक बुद्धिमान व्यक्ति की प्रतिबद्धता मौसम (गर्मी या सर्दी), आंतरिक भावनाओं (भय या अनुराग), या सामाजिक स्थिति (संपत्ति या गरीबी) जैसी बाहरी स्थितियों से विचलित नहीं होती है। मानसिक अनुशासन का यह स्तर और परिस्थितियों की परवाह किए बिना कर्म पर ध्यान केंद्रित करना सच्चे ज्ञान और बुद्धिमत्ता की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। छह वस्तुएँ युग्मों में रखी गई हैं, और यही क्रम तर्क है: शीत और उष्ण शरीर के हैं, भय और रति मन के, समृद्धि और असमृद्धि परिस्थिति की। ये मिलकर उन सभी दिशाओं को घेर लेती हैं जहाँ से संकल्प टूट सकता है। यह श्लोक विदुर द्वारा गिनाए गए पण्डित-लक्षणों की उसी लम्बी शृंखला का है, जो निद्राहीन धृतराष्ट्र से रात्रिभर कही गई, और जिसमें प्रत्येक श्लोक उस शब्द पर एक और कसौटी जोड़ता जाता है।
मूल पोस्ट
विदुर नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।