दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
dadhānā karapadmābhyām akṣamālā-kamaṇḍalū । devī prasīdatu mayi brahmacāriṇy-anuttamā ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमां ब्रह्मचारिणी के चरणों में कोटि-कोटि नमन! देवी मां सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू का अर्थ
जो देवी अपने करकमलों में जपमाला और कमंडल धारण करती हैं, अत्यंत श्रेष्ठ ब्रह्मचारिणी देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
शब्दार्थ
- दधानाdadhānā
धारण किए हुए
√धा
- करपद्माभ्याम्karapadmābhyām
कमल-सदृश दोनों हाथों से
कर + पद्म
- अक्षमालाakṣamālā
अक्षमाला
अक्ष + माला
- कमण्डलूkamaṇḍalū
और कमण्डलु
कमण्डलु
- देवीdevī
देवी
√दिव्
- प्रसीदतुprasīdatu
प्रसन्न हों
प्र + √सद्
- मयिmayi
मुझ पर
अस्मद्
- ब्रह्मचारिणीbrahmacāriṇī
ब्रह्मचारिणी
ब्रह्मन् + √चर्
- अनुत्तमाanuttamā
जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं
अन् + उत्तम
व्याख्या
माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पार्वती के उस कठोर तप को दर्शाता है जो उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए किया था। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। उनके दाहिने हाथ में अक्षमाला (जपमाला) निरंतर मंत्र जप और सात्विक जीवन का प्रतीक है, जबकि बाएं हाथ में कमंडल उनकी सादगी और निस्पृहता को दर्शाता है। यह स्वरूप साधक को सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने संकल्प से विचलित न होना और निरंतर 'तप' करते रहना ही सिद्धि का एकमात्र मार्ग है।
मूल पोस्ट
नवदुर्गा स्तोत्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।