पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
piṇḍajapravarārūḍhā caṇḍakopāstrakairyutā । prasādaṁ tanute mahyaṁ candraghaṇṭeti viśrutā ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमां चंद्रघंटा को प्रणाम! माता से प्रार्थना है कि वे हर किसी को सशक्त, समृद्ध और सौभाग्यपूर्ण जीवन का आशीष दें।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता का अर्थ
सिंह पर सवार और भयंकर अस्त्र धारण करने वाली माँ चंद्रघंटा हम पर कृपा करें और हमसे प्रसन्न हों।
शब्दार्थ
- पिण्डजप्रवरारूढाpiṇḍajapravarārūḍhā
श्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़
पिण्ड + √जन् + प्रवर + आ + √रुह्
- चण्डकोपास्त्रकैःcaṇḍakopāstrakaiḥ
प्रचण्ड कोप के अस्त्रों से
चण्ड + कोप + अस्त्र
- युताyutā
युक्त
√युज्
- प्रसादम्prasādam
प्रसाद
प्र + √सद्
- तनुतेtanute
विस्तार करती हैं
√तन्
- मह्यम्mahyam
मुझे
अस्मद्
- चन्द्रघण्टाcandraghaṇṭā
चन्द्रघण्टा
चन्द्र + घण्टा
- इति विश्रुताiti viśrutā
इस नाम से विख्यात
वि + √श्रु
व्याख्या
यह ध्यान श्लोक नवदुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा को संबोधित है। इसमें उन्हें ‘पिण्डजप्रवर’, अर्थात प्राणियों या पशुओं में श्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़, प्रचण्ड कोप के अस्त्रों से युक्त और साधक को प्रसाद देने वाली कहा गया है। उस वाहन को विशेष रूप से सिंह मानना चंद्रघंटा की परंपरागत प्रतिमा से आता है; श्लोक में सिंह का स्पष्ट शब्द नहीं है। इसी प्रकार संस्कृत उनके हाथों की संख्या या उनमें धारण वस्तुओं की सूची नहीं देता; वह विवरण व्यापक मूर्तिशास्त्रीय परंपरा का है। यह संक्षिप्त श्लोक उग्र आयुधयुक्त रूप को ‘प्रसाद’ की याचना के साथ जोड़ता है, जिससे रक्षक साहस का भक्तिपरक अर्थ लिया जा सकता है, पर हर परिचित प्रतिमा-विवरण को शाब्दिक कथन नहीं मानना चाहिए।
मूल पोस्ट
नवदुर्गा स्तोत्रम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।