उद्यच्छेदेव न नमेत् - प्रयत्न करो, झुको मत

18 अग॰ 2026

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कस्यचित्॥

udyacched eva na named udyamo hy eva pauruṣam । apy aparvaṇi bhajyeta na named iha kasyacit ॥

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव का अर्थ

मनुष्य को सदैव आत्मसम्मान, साहस और स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहिए। सच्चा पुरुषार्थ और पराक्रम इसी में है कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता न करे, बल्कि सत्य, धैर्य और आत्मगौरव के साथ अपने आदर्शों पर दृढ़ रहे।

शब्दार्थ

उद्यच्छेत्udyacchet

उद्यम करे, प्रयत्न करे

उद् + √यम्

सन्धि: उद्यच्छेत् + एव = उद्यच्छेदेव।

एवeva

ही, निश्चय ही

नna

नहीं

नमेत्namet

झुके

√नम्

सन्धि: नमेत् + उद्यमः = नमेदुद्यमो।

उद्यमःudyamaḥ

उद्यम, सतत प्रयत्न

उद् + √यम्

'उद्यच्छेत्' के समान ही धातु से; श्लोक क्रिया को उसी क्रिया से परिभाषित करता है।

हिhi

ही, क्योंकि

'ह्येव' में संधिगत।

पौरुषम्pauruṣam

पौरुष, पराक्रम

पुरुष

अपिapi

भी, चाहे

अपर्वणिaparvaṇi

बिना गाँठ के स्थान पर

अ + पर्वन्

बेंत गाँठ पर ही झुकता है; यहाँ झुकने का कोई स्थान नहीं।

भज्येतbhajyeta

टूट जाए

√भञ्ज्

कर्मवाच्य विधिलिङ्: भले टूट जाए।

नमेत्namet

झुके

√नम्

इहiha

यहाँ, इस लोक में

कस्यचित्kasyacit

किसी के भी आगे

किम् + चित्

व्याख्या

यह श्लोक दो विपरीत क्रियाओं पर टिका है: 'उद्यच्छेत्', अर्थात उठकर प्रयत्न करना, और 'न नमेत्', अर्थात न झुकना। इसका केंद्रीय कथन—'उद्यमो ह्येव पौरुषम्'—पौरुष को पहले से प्राप्त शक्ति नहीं, बल्कि निरंतर प्रयत्न करने की क्रिया के रूप में परिभाषित करता है। दूसरी पंक्ति बिना गाँठ वाले स्थान पर भी टूट जाने, पर किसी के सामने न झुकने की छवि से इस दृढ़ता को और तीव्र करती है। 'न नमेत्' की पुनरावृत्ति विजय के बजाय अडिग रहने को साहस की कसौटी बनाती है। श्लोक यह आश्वासन नहीं देता कि प्रयत्न से हर पराजय टल जाएगी, क्योंकि 'भज्येत' टूट जाने की संभावना को स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है। वह गरिमा को अपनी निष्ठा छोड़े बिना प्रयत्न करते रहने में रखता है; दिया गया अर्थ इसे आत्मसम्मान, सिद्धांतों और मूल्यों की भाषा में विकसित करता है, जबकि सत्य और धैर्य संस्कृत में पृथक रूप से आए शब्द नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन में इसके अनुप्रयोग हैं।

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