उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कस्यचित्॥
udyacched eva na named udyamo hy eva pauruṣam । apy aparvaṇi bhajyeta na named iha kasyacit ॥
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव का अर्थ
मनुष्य को सदैव आत्मसम्मान, साहस और स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहिए। सच्चा पुरुषार्थ और पराक्रम इसी में है कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता न करे, बल्कि सत्य, धैर्य और आत्मगौरव के साथ अपने आदर्शों पर दृढ़ रहे।
शब्दार्थ
- उद्यच्छेत्udyacchet
उद्यम करे, प्रयत्न करे
उद् + √यम्
सन्धि: उद्यच्छेत् + एव = उद्यच्छेदेव।
- एवeva
ही, निश्चय ही
- नna
नहीं
- नमेत्namet
झुके
√नम्
सन्धि: नमेत् + उद्यमः = नमेदुद्यमो।
- उद्यमःudyamaḥ
उद्यम, सतत प्रयत्न
उद् + √यम्
'उद्यच्छेत्' के समान ही धातु से; श्लोक क्रिया को उसी क्रिया से परिभाषित करता है।
- हिhi
ही, क्योंकि
'ह्येव' में संधिगत।
- पौरुषम्pauruṣam
पौरुष, पराक्रम
पुरुष
- अपिapi
भी, चाहे
- अपर्वणिaparvaṇi
बिना गाँठ के स्थान पर
अ + पर्वन्
बेंत गाँठ पर ही झुकता है; यहाँ झुकने का कोई स्थान नहीं।
- भज्येतbhajyeta
टूट जाए
√भञ्ज्
कर्मवाच्य विधिलिङ्: भले टूट जाए।
- नमेत्namet
झुके
√नम्
- इहiha
यहाँ, इस लोक में
- कस्यचित्kasyacit
किसी के भी आगे
किम् + चित्
व्याख्या
यह श्लोक दो विपरीत क्रियाओं पर टिका है: 'उद्यच्छेत्', अर्थात उठकर प्रयत्न करना, और 'न नमेत्', अर्थात न झुकना। इसका केंद्रीय कथन—'उद्यमो ह्येव पौरुषम्'—पौरुष को पहले से प्राप्त शक्ति नहीं, बल्कि निरंतर प्रयत्न करने की क्रिया के रूप में परिभाषित करता है। दूसरी पंक्ति बिना गाँठ वाले स्थान पर भी टूट जाने, पर किसी के सामने न झुकने की छवि से इस दृढ़ता को और तीव्र करती है। 'न नमेत्' की पुनरावृत्ति विजय के बजाय अडिग रहने को साहस की कसौटी बनाती है। श्लोक यह आश्वासन नहीं देता कि प्रयत्न से हर पराजय टल जाएगी, क्योंकि 'भज्येत' टूट जाने की संभावना को स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है। वह गरिमा को अपनी निष्ठा छोड़े बिना प्रयत्न करते रहने में रखता है; दिया गया अर्थ इसे आत्मसम्मान, सिद्धांतों और मूल्यों की भाषा में विकसित करता है, जबकि सत्य और धैर्य संस्कृत में पृथक रूप से आए शब्द नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन में इसके अनुप्रयोग हैं।
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।