सुखोपविष्टास्ते तत्र - पुरुषार्थों का आधार आरोग्य

28 सित॰ 2026

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः का अर्थ

तेजस्वी महर्षियों ने सुखपूर्वक विराजते हुए पुण्यशालिनी कथा का वर्णन किया है। जिसके अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- जीवन के इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का मुख्य आधार अच्छा स्वास्थ्य है।

शब्दार्थ

सुखोपविष्टाःsukhopaviṣṭāḥ

सुखपूर्वक बैठे हुए

सुख + उप + √विश्

ते तत्रte tatra

वे वहाँ

पुण्याम्puṇyām

पुण्यकारी या मंगलमयी

चक्रुःcakruḥ

उन्होंने की

√कृ

कथाम् इमाम्kathām imām

इस कथा या विमर्श को

धर्मार्थकाममोक्षाणाम्dharmārthakāmamokṣāṇām

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के

धर्म + अर्थ + काम + मोक्ष

आरोग्यम्ārogyam

आरोग्य या रोग का अभाव

अ + रोग

मूलम् उत्तमम्mūlam uttamam

सर्वोत्तम आधार

व्याख्या

श्लोक के आरम्भ में महर्षि सुखपूर्वक बैठे हुए एक 'पुण्यां कथाम्', अर्थात् मंगलकारी विमर्श, करते दिखाई देते हैं। इसके बाद आरोग्य को चारों पुरुषार्थों का उत्तम मूल कहा गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को एक साथ रखकर श्लोक नैतिक कर्तव्य, जीवनोपयोगी साधन, मानवीय कामनाएँ और आध्यात्मिक मुक्ति सभी को समेटता है। यहाँ स्वास्थ्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। वह प्रत्येक सार्थक लक्ष्य की ओर बढ़ने का आधार है। शान्त भाव से बैठे ऋषियों का दृश्य भी इस शिक्षा के अनुकूल है, क्योंकि उसमें शारीरिक सहजता और विचारपूर्ण संवाद साथ आते हैं। आज के जीवन में यह कथन स्वास्थ्य-संरक्षण को केवल निजी सुविधा नहीं, बल्कि कर्तव्य और उद्देश्यपूर्ण कर्म की सामर्थ्य के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।

मूल पोस्ट

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चरक संहिता से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

स्वास्थ्यकल्याण
9 फ़र॰ 2026
चरक संहिता

विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया। यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते॥

vidyā vitarko vijñānaṃ smṛtis tatparatā kriyā । yasyaite ṣaḍguṇās tasya nāsādhyam ativartate ॥

विद्या, तर्क, विवेकपूर्ण ज्ञान, स्मृति, तत्परता और सक्रिय प्रयास मिलकर व्यक्ति को कठिन कार्य सिद्ध करने का व्यावहारिक सामर्थ्य देते हैं।

विद्यासामर्थ्यशिक्षाकर्म

स्वास्थ्य पर और सुभाषित

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23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

स्वास्थ्यकल्याण
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि