सिद्धिः साध्ये सतामस्तु - संकल्प से सिद्धि

6 अप्रैल 2026

सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः। जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला॥

siddhiḥ sādhye satām astu prasādāt tasya dhūrjaṭeḥ । jāhnavī-phena-lekheva yan-mūrdhni śaśinaḥ kalā ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

दृढ़ संकल्प वह शक्ति है, जो कठिन से कठिन चुनौती को भी आसान बना देती है। हमारे परिश्रमी कार्यकर्ता इसके जीवंत उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने समर्पण और सेवा-भाव से भाजपा को इस ऐतिहासिक ऊंचाई तक पहुंचाया है। पार्टी के स्थापना दिवस पर उन्हें मेरी ढेरों शुभकामनाएं।

सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य का अर्थ

जिन महादेव के मस्तक पर गंगा के झाग की रेखा के समान चन्द्रमा की कला सुशोभित होती है, उन महादेव की कृपा से दृढ संकल्प वाले सज्जनों के कार्य सफलता को प्राप्त हों।

शब्दार्थ

सिद्धिःsiddhiḥ

सिद्धि

√सिध्

साध्येsādhye

साध्य में

√साध्

सताम्satām

सज्जनों की

√अस्

अस्तुastu

हो

√अस्

प्रसादात्prasādāt

कृपा से

प्र + √सद्

तस्य धूर्जटेःtasya dhūrjaṭeḥ

उन धूर्जटि की

धूर् + जट

जाह्नवीफेनलेखा इवjāhnavīphenalekheva

गंगा की फेनरेखा के समान

जाह्नवी + फेन + लेखा

यन्मूर्ध्निyanmūrdhni

जिनके मस्तक पर

मूर्धन्

शशिनः कलाśaśinaḥ kalā

चन्द्रमा की कला

शशिन् + कला

व्याख्या

यह प्रसिद्ध नीतिग्रन्थ 'हितोपदेश' का मङ्गलाचरण है। इसमें भगवान शिव (धूर्जटि) का आवाहन है; उनके मस्तक पर शोभित चन्द्रकला की तुलना पवित्र गङ्गा की फेनरेखा से की गई है। प्रार्थना है कि उनकी कृपा से सज्जनों के कार्य सिद्ध हों। अतः यह श्लोक उपदेश और प्रयत्न का सामान्य सूत्र देने के बजाय ग्रन्थ के आरम्भ में नेक उद्यमों की सफलता के लिए मङ्गलकामना करता है। उपमा अपने ही चित्र के भीतर से ली गई है: गङ्गा के फेन से उपमित चन्द्रकला उसी मस्तक पर है जिससे परम्परा गङ्गा को जोड़ती है।

मूल पोस्ट

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हितोपदेश से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
5 अग॰ 2026
शिशुपालवधम्

आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती। तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते॥

ātmodayaḥ parajānir dvayaṁ nītir itīyatī । tadūrīkṛtya kṛtibhir vācaspatyaṁ pratāyate ॥

माघ के शिशुपालवध का यह श्लोक नीति को अपने उत्थान और प्रतिपक्षी की हानि के दो स्पष्ट पक्षों में रखता है।

सुशासनसफलता
18 मई 2026
चाणक्य नीति

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।

दृढ़ताविद्याधर्मसमृद्धिअनुशासन

भक्ति पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य