चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः। कृच्छ्रेऽपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः॥
calanti girayaḥ kāmaṃ yugāntapavanāhatāḥ । kṛcchre'pi na calatyeva dhīrāṇāṃ niścalaṃ manaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशधैर्य किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है। इससे कठिन चुनौतियों के बीच भी देश को एकजुट रहने के साथ ही प्रगति, समृद्धि और आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः का अर्थ
प्रलय के समय प्रचण्ड वायु के प्रहार से पर्वत भी विचलित होकर हिलने लगते हैं किन्तु विपत्तियों के बीच भी धैर्यवान का मन अचल और अविचलित बना रहता है।
शब्दार्थ
- चलन्तिcalanti
हिल जाते हैं
√चल्
- गिरयःgirayaḥ
पर्वत
गिरि
- कामम्kāmam
भले ही
- युगान्तपवनाहताःyugāntapavanāhatāḥ
युगान्त की वायु से आहत
युग + अन्त + पवन + आ + √हन्
- कृच्छ्रेkṛcchre
संकट में
कृच्छ्र
- अपिapi
भी
- न चलति एवna calaty eva
तनिक भी विचलित नहीं होता
√चल्
- धीराणाम्dhīrāṇām
धीरों का
√धृ
- निश्चलम्niścalam
निश्चल
निस् + √चल्
- मनःmanaḥ
मन
मनस्
व्याख्या
यह श्लोक एक प्रभावशाली विरोधाभास के माध्यम से धैर्य का अर्थ समझाता है। युगांत के समय प्रचंड वायु से पर्वत भी हिल सकते हैं; बाहरी जगत में जो सबसे स्थिर दिखता है, वह भी अत्यधिक बल से विचलित हो सकता है। इसके विपरीत श्लोक धीर पुरुष के मन को रखता है, जो कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपनी आंतरिक स्थिरता नहीं खोता। यहाँ 'धीर' का अर्थ केवल साहसी नहीं, बल्कि संयमी, धैर्यवान और विवेकपूर्ण व्यक्ति भी है। यह शिक्षा निष्क्रिय बने रहने की नहीं, बल्कि दबाव में भी संतुलित रहने की है। अचल मन अव्यवस्था का सामना कर सकता है, पर स्वयं अव्यवस्थित नहीं होता। प्रधानमंत्री के संदेश के संदर्भ में यही गुण राष्ट्रीय शक्ति बन जाता है: धैर्य और स्थिरता लोगों को चुनौतियों के बीच एकजुट रखती है और प्रगति, समृद्धि तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
चण्डकौशिकम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।