प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥
prajāsukhe sukhaṁ rājñaḥ prajānāṁ ca hite hitam । nātmapriyaṁ priyaṁ rājñaḥ prajānāṁ tu priyaṁ priyam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशपंचायती राज दिवस के अवसर पर देशभर के जनप्रतिनिधियों का हार्दिक अभिनंदन! जनसेवा के साथ राष्ट्रसेवा के प्रति आप सभी का समर्पण हर किसी को प्रेरित करने वाला है।
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां का अर्थ
प्रजा के सुख में जनप्रतिनिधि का सुख है, प्रजा के हित में ही उसका हित है। जनसेवक का अपना प्रिय कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय होता है।
शब्दार्थ
- प्रजासुखेprajāsukhe
प्रजा के सुख में
प्रजा + सुख
- सुखम्sukham
सुख है
सुख
- राज्ञःrājñaḥ
राजा का
राजन्
- प्रजानाम्prajānām
प्रजा का
प्रजा
- चca
और
- हितेhite
हित में
√धा
- हितम्hitam
हित है
√धा
- नna
नहीं
- आत्मप्रियम्ātmapriyam
जो स्वयं को प्रिय हो
आत्मन् + प्रिय
- प्रियम्priyam
प्रिय है
√प्री
- तुtu
किन्तु
व्याख्या
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह कालजयी श्लोक राजधर्म और स्वैच्छिक सेवा के उच्चतम आदर्श को प्रस्तुत करता है। चाणक्य के अनुसार, एक वास्तविक शासक या जनप्रतिनिधि वह है जो अपने व्यक्तिगत सुख-दुख को त्यागकर स्वयं को प्रजा के हितों के साथ पूर्णतः एकाकार कर लेता है। 'नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः' का अर्थ है कि जनसेवक का अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं होना चाहिए जो लोक-कल्याण के विरुद्ध हो। यह श्लोक पंचायती राज की उस मूल भावना को भी दर्शाता है जहाँ स्थानीय नेतृत्व सीधे जनता की सेवा और उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध होता है।
मूल पोस्ट
अर्थशास्त्र से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंराज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम्। दक्षिणा वृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिषेचनम्॥
rājño hi vratamutthānaṁ yajñaḥ kāryānuśāsanam । dakṣiṇā vṛttisāmyaṁ ca dīkṣitasyābhiṣecanam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक एक राजा या जनप्रतिनिधि के सच्चे कर्तव्यों और पवित्र संकल्प का वर्णन करता है।
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥
anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥
निष्क्रियता निश्चित अवनति लाती है, जबकि उद्यम और परिश्रम से ही समृद्धि तथा सार्थक फल प्राप्त होते हैं।
सुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।