अर्थशास्त्र से सुभाषित
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नवीनतम अद्यतन: 21 जून 2026
संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन
29 अप्रैल 2026
अर्थशास्त्र
राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम्। दक्षिणा वृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिषेचनम्॥
rājño hi vratamutthānaṁ yajñaḥ kāryānuśāsanam । dakṣiṇā vṛttisāmyaṁ ca dīkṣitasyābhiṣecanam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक एक राजा या जनप्रतिनिधि के सच्चे कर्तव्यों और पवित्र संकल्प का वर्णन करता है।
सुशासननेतृत्वकर्तव्यनैतिकता
24 अप्रैल 2026
अर्थशास्त्र
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥
prajāsukhe sukhaṁ rājñaḥ prajānāṁ ca hite hitam । nātmapriyaṁ priyaṁ rājñaḥ prajānāṁ tu priyaṁ priyam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक सुशासन के मूल सिद्धांत को परिभाषित करता है: जनता की खुशी में ही नेतृत्व की सार्थकता है।
सुशासननेतृत्वकर्तव्यनैतिकता
19 जन॰ 2026
अर्थशास्त्र
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥
anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥
निष्क्रियता निश्चित अवनति लाती है, जबकि उद्यम और परिश्रम से ही समृद्धि तथा सार्थक फल प्राप्त होते हैं।
दृढ़ताअनुशासनसफलतासमृद्धि