क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति॥
krodhaḥ prāṇaharaḥ śatruḥ krodho mitramukho ripuḥ । krodho hy asir mahātīkṣṇaḥ sarvaṃ krodho ’pakarṣati ॥
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो का अर्थ
क्रोध प्राणघातक शत्रु है तथा मित्र के रूप में व्यवहार करने वाले शत्रु के समान है। तीक्ष्ण तलवार के समान यह क्रोध सब प्रकार से अवनति का कारण बनता है।
शब्दार्थ
- क्रोधःkrodhaḥ
क्रोध
√क्रुध्
- प्राणहरःprāṇaharaḥ
प्राण हरने वाला
प्राण + √हृ
- शत्रुःśatruḥ
शत्रु
शत्रु
- मित्रमुखःmitramukhaḥ
मित्र का मुख धारण किए
मित्र + मुख
- रिपुःripuḥ
रिपु
रिपु
- हिhi
निश्चय ही
- असिःasiḥ
असि, तलवार
असि
- महातीक्ष्णःmahātīkṣṇaḥ
अत्यन्त तीक्ष्ण
महा + √तिज्
- सर्वम्sarvam
सब कुछ
सर्व
- अपकर्षतिapakarṣati
नीचे खींच ले जाता है
अप + √कृष्
व्याख्या
रामायण का यह श्लोक क्रोध की विनाशकारी शक्ति के विरुद्ध एक कड़ी चेतावनी के रूप में कार्य करता है। यह क्रोध को एक 'प्राणघातक शत्रु' के रूप में वर्णित करता है जो अक्सर एक मित्र के मुखौटे के पीछे छिपा होता है, जिससे व्यक्ति को यह विश्वास हो जाता है कि उसका गुस्सा उचित या सहायक है। क्रोध की तुलना एक तीक्ष्ण तलवार से करके, यह श्लोक स्पष्ट करता है कि यह भावना अंततः उस व्यक्ति को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती है जो इसे धारण करता है, जिससे उसका आध्यात्मिक और सामाजिक पतन होता है। श्लोक क्रोध का नाम चार बार लेता है, और ये नाम दोहराव नहीं, आरोहण हैं: पहले शत्रु, फिर मित्र का मुख धारण किए हुए शत्रु, फिर अत्यन्त तीक्ष्ण असि। प्रत्येक पिछले से अधिक निकट है, यहाँ तक कि संकट बाहर रह ही नहीं जाता। अन्तिम क्रिया 'अपकर्षति' का अर्थ है नीचे खींच ले जाना—अतः यहाँ वर्णित विनाश एक आघात नहीं, धीरे-धीरे खिंचते चले जाना है।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
नैतिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।