अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशआप सभी को भगवान विश्वकर्मा जयंती की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। देवशिल्पी से जुड़े इस दिव्य अवसर पर निर्माण कार्यों में जुटे देशभर के शिल्पकारों एवं हुनरमंद साथियों को मेरा विशेष अभिनंदन। आपका कौशल एवं परिश्रम विकसित और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्र के नवनिर्माण की दिशा में आपके प्रयासों को हरसंभव प्रोत्साहन मिलता रहे, इसके लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः का अर्थ
भगवान विश्वकर्मा अनादि और अप्रमेय हैं। उनका कोई एक निश्चित रूप नहीं है। वे जय-पराजय का निर्धारण करने वाले हैं। यह सम्पूर्ण संसार भगवान विश्वकर्मा का ही स्वरूप है और वे इस जगत के पालनकर्ता हैं। ऐसे विश्व के निर्माता भगवान विश्वकर्मा को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
शब्दार्थ
- अनादिःanādiḥ
जिसका कोई आदि न हो, अनादि
अन् + आदि
निरन्तर पाठ में अप्रमेयः से पहले अनादिः का रूप अनादिर् हो जाता है।
- अप्रमेयः चaprameyaś ca
और जो मापा न जा सके, अप्रमेय
अ + प्र + √मा
सन्धि: अप्रमेयः + च = अप्रमेयश्च।
- अरूपः चarūpaś ca
और अरूप, किसी एक रूप में सीमित नहीं
अ + रूप
सन्धि: अरूपः + च = अरूपश्च।
- जयाजयःjayājayaḥ
जय और पराजय; दोनों के नियन्ता
जय + अजय
- लोकरूपःlokarūpaḥ
जिनका स्वरूप संसार है
लोक + रूप
जगन्नाथः से पहले सन्धि होकर लोकरूपो बनता है।
- जगन्नाथःjagannāthaḥ
जगत के स्वामी
जगत् + नाथ
- विश्वकर्मन्viśvakarman
हे विश्वकर्मा
विश्वकर्मन्
विश्वकर्मा को सीधे सम्बोधित करने वाला सम्बोधन एकवचन।
- नमः नमःnamo namaḥ
बार-बार प्रणाम
नमस्
सन्धि: नमः + नमः = नमो नमः।
व्याख्या
यह श्लोक विश्वकर्मा का वर्णन उन विशेषणों से करता है जो सामान्य माप और दृश्य रूप की सीमाओं से परे हैं। ‘अनादि’ उन्हें आरम्भ से रहित, ‘अप्रमेय’ पूर्णतः मापे या सीमित न किए जा सकने वाला और ‘अरूप’ किसी एक रूप में न बँधा हुआ बताता है। ‘जयाजय’ में जय और पराजय दोनों उनके अधीन आते हैं, जबकि ‘लोकरूप’ और ‘जगन्नाथ’ क्रमशः समस्त लोक को उनका स्वरूप और उन्हें जगत का नाथ कहते हैं। अन्त का ‘नमो नमः’ इन विशेषताओं को केवल दार्शनिक कथन न रहने देकर बार-बार किए गए व्यक्तिगत प्रणाम में बदल देता है। विश्वकर्मा जयंती का साथ दिया गया संदेश इस भक्तिपूर्ण दृष्टि को कौशल और निर्माण के क्षेत्र से जोड़ते हुए राष्ट्र-निर्माण में लगे शिल्पकारों और हुनरमंद साथियों का सम्मान करता है। यह उत्सव के अनुरूप आधुनिक प्रयोग है, जबकि संस्कृत श्लोक का सीधा विषय विश्वकर्मा का अतीन्द्रिय स्वरूप, जगत में उनकी व्यापक अभिव्यक्ति और भक्त का नमन है। अरूप से लोकरूप तक की इसकी गति यह भाव भी जगाती है कि सृजित जगत के अनेक रूपों में दिव्य सृजनशीलता को देखा जा सकता है।
मूल पोस्ट
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥
mudākarāttamodakaṁ sadā vimuktisādhakaṁ kalādharāvataṁsakaṁ vilāsilokarakṣakam । anāyakaikanāyakaṁ vināśitebhadaityakaṁ natāśubhāśunāśakaṁ namāmi taṁ vināyakam ॥
श्रीविनायक की यह भक्तिपूर्ण स्तुति उन्हें मुक्ति के साधक, जगत् के रक्षक और अशुभ के शीघ्र नाशक के रूप में नमन करती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।