विश्वकर्माष्टकम् से सुभाषित

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नवीनतम अद्यतन: 17 सित॰ 2026

17 सित॰ 2026
विश्वकर्माष्टकम्

अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥

anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥

विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।

भक्तिआध्यात्मिकता