शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात् परं सुखम्। न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥
śāntitulyaṁ tapo nāsti na santoṣāt paraṁ sukham । na tṛṣṇāyāḥ paro vyādhir na ca dharmo dayāparaḥ ॥
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न का अर्थ
शान्ति के समान कोई तप नहीं और न ही सन्तोष से श्रेष्ठ कोई सुख। तृष्णा से बढ़कर कोई रोग नहीं और न ही दया से श्रेष्ठ कोई धर्म।
शब्दार्थ
- शान्तितुल्यम्śāntitulyam
शान्ति के तुल्य
शान्ति + तुल्य
- तपःtapaḥ
तप
√तप्
- न अस्तिnāsti
नहीं है
√अस्
- सन्तोषात्santoṣāt
सन्तोष से
सम् + √तुष्
- परम्param
बढ़कर
पर
- सुखम्sukham
सुख
सुख
- तृष्णायाःtṛṣṇāyāḥ
तृष्णा से
√तृष्
- परःparaḥ
बड़ा
पर
- व्याधिःvyādhiḥ
व्याधि
वि + आ + √धा
- चca
और
- धर्मःdharmaḥ
धर्म
√धृ
- दयापरःdayāparaḥ
दया को परम मानने वाला
दया + पर
व्याख्या
चाणक्य नीति का यह अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक जीवन के चार महत्वपूर्ण पहलुओं को परिभाषित करता है। यह स्पष्ट करता है कि आंतरिक शान्ति ही सबसे बड़ी तपस्या है। सन्तोष को परम सुख माना गया है, क्योंकि बाहरी साधन कभी स्थायी तृप्ति नहीं दे सकते। 'तृष्णा' यानी कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं को सबसे घातक रोग बताया गया है, जो मनुष्य को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से रोगी बनाए रखती है। अंत में, यह 'दया' को सर्वोच्च धर्म घोषित करता है, जो हमें मानवता के प्रति हमारे मूल कर्तव्य की याद दिलाता है।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
शांति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।