एको बहूनामसि - अदम्य वीरता और संकल्प

29 जन॰ 2026

एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि। अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि॥

eko bahūnāmasi manya īḍitā viśaṃ viśaṃ yuddhāya saṃ śiśādhi । akṛttaruk tvayā yujā vayaṃ dyumantaṃ ghoṣaṃ vijayāya kṛṇmasi ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आज शाम बीटिंग रिट्रीट का आयोजन होगा। यह गणतंत्र दिवस समारोहों के समापन का प्रतीक है। इसमें भारत की समृद्ध सैन्य विरासत की शक्ति दिखाई देगी। देश की रक्षा में समर्पित अपने सशस्त्र बलों पर हमें अत्यंत गर्व है।

एको बहूनामसि मन्य ईडिता का अर्थ

हे वीर! तुम्हारा क्रोध विवेकपूर्ण होना चाहिए। तुम हजारों में एक शूरवीर हो। सम्मान के साथ अपने लोगों को तुम शासन करना व युद्ध करना सिखाओ। तुम्हारे साथ हम लोग विजय प्राप्ति के लिए जयघोष करना चाहते हैं।

शब्दार्थ

एकःekaḥ

अकेले

एक

बहूनाम्bahūnām

बहुतों में

बहु

असिasi

तुम हो

√अस्

मन्यmanya

हे मन्यु, हे क्रोध-देवता

मन्यु

ईडिताīḍitā

स्तुत

√ईड्

विशं विशम्viśaṁ viśam

कुल-कुल को

विश्

युद्धायyuddhāya

युद्ध के लिए

√युध्

सं शिशाधिsaṁ śiśādhi

तैयार करो

सम् + √शा

अकृत्तरुक्akṛttaruk

अखण्ड तेज वाले

अ + √कृत् + रुच्

त्वया युजाtvayā yujā

तुम्हारे सहयोग से

√युज्

वयम्vayam

हम

अस्मद्

द्युमन्तम् घोषम्dyumantaṁ ghoṣam

तेजस्वी घोष

द्यु + घोष

विजयायvijayāya

विजय के लिए

वि + √जि

कृण्मसिkṛṇmasi

हम करते हैं

√कृ

व्याख्या

अथर्ववेद शौनक संहिता के मन्यु सूक्त का यह मंत्र 'मन्यु' यानी धर्म-सम्मत क्रोध या अदम्य संकल्प का आह्वान करता है; ऋग्वेद में इसका एक समानांतर पाठ मिलता है। यह सिखाता है कि वीरता केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि विवेक और सम्मान (Honour) से प्रेरित होनी चाहिए। 'एको बहूनामसि' कहकर यह उस नेतृत्व की महत्ता को बताता है जो हजारों लोगों को सही दिशा में ले जाने की क्षमता रखता है। बीटिंग रिट्रीट के अवसर पर यह मंत्र भारतीय सेना के शौर्य और अनुशासन की उस परंपरा को प्रतिबिंबित करता है जहाँ विजय केवल एक पराक्रम नहीं, बल्कि एक पावन कर्तव्य और सामूहिक नाद है। आरम्भ में मन्यु—क्रोध के देवतारूप—को सम्बोधित किया गया है: अथर्ववेद के पाठ में 'manya īḍitā', अर्थात् 'हे स्तुत मन्यु', जबकि ऋग्वैदिक समानांतर में 'manyav īḍitaḥ' है। इसलिए दिया गया अर्थ क्रोध को विषय मानने में सही है, यद्यपि क्रोध को विवेक से संयमित करने का निर्देश श्लोक का शाब्दिक वाक्य नहीं, उसका व्याख्यात्मक प्रयोग है। ऋचा मन्यु से विश-विश को युद्ध के लिए तैयार करने की प्रार्थना करती है।

मूल पोस्ट

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अथर्ववेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता

साहस पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा