अहिंसा परमो धर्मः - सर्वोच्च कर्तव्य और सत्य

30 जन॰ 2026

अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥

ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

बापू ने मानवता की रक्षा के लिए हमेशा अहिंसा पर बल दिया। इसमें वह शक्ति है, जो बिना हथियार के दुनिया को बदल सकती है।

अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः का अर्थ

अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, अहिंसा ही सबसे बड़ा तप है और अहिंसा ही परम सत्य है, जिससे धर्म की स्थापना होती है।

शब्दार्थ

अहिंसाahiṁsā

अहिंसा

अ + √हिंस्

नञ् समास—हिंसा का अभाव, उसका दमन नहीं।

परमःparamaḥ

सर्वोच्च

परम

धर्मःdharmaḥ

धर्म

√धृ

तथाtathā

वैसे ही

परन्तपःparantapaḥ

परम तप

परम + तपस्

परमम्paramam

परम

परम

सत्यम्satyam

सत्य

√अस्

यतःyataḥ

जिससे

यद्

प्रवर्ततेpravartate

प्रवृत्त होता है

प्र + √वृत्

संक्षिप्त उद्धरण में यही कारण-वाक्य छूट जाता है।

व्याख्या

महाभारत का यह प्रसिद्ध श्लोक भारतीय नीतिशास्त्र और अध्यात्म में अहिंसा की केंद्रीयता बताता है। अहिंसा यहाँ केवल किसी को हानि न पहुँचाने का निषेध नहीं, बल्कि सक्रिय नैतिक और आध्यात्मिक अनुशासन है। स्रोत-पाठ अहिंसा को तीन स्तरों पर रखता है—परम धर्म, परम तप और परम सत्य—और फिर कहता है कि उसी से धर्म प्रवृत्त होता है। वर्तमान पाठ में 'परन्तपः' है, जबकि स्रोत में 'परं तपः'; इसलिए 'परन्तपः' का अर्थ 'परम तप' नहीं किया जा सकता। दिया गया अर्थ अहिंसा को सर्वोच्च तप बताने में स्रोत-पाठ के अभिप्रेत रूप का अनुसरण करता है। इस प्रकार श्लोक केवल धर्मों में अहिंसा की श्रेष्ठता नहीं, धर्म के आधार के रूप में उसकी भूमिका प्रतिपादित करता है।

मूल पोस्ट

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महाभारत से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

अहिंसा पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता