नाम्भोधिरर्थितामेति - पात्रता और समृद्धि

2 फ़र॰ 2026

नाम्भोधिरर्थितामेति सदाम्भोभिश्च पूर्यते। आत्मा तु पात्रतां नेयः पात्रमायान्ति सम्पदः॥

nāmbhodhir arthitām eti sadāmbhobhiśca pūryate । ātmā tu pātratāṁ neyaḥ pātramāyānti sampadaḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आत्मनिर्भरता वह दीपक है, जो आत्मसम्मान और सामर्थ्य का मार्ग दिखाता है। इस बार का बजट भी हमारे युवा साथियों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला है।

नाम्भोधिरर्थितामेति सदाम्भोभिश्च पूर्यते का अर्थ

समुद्र कभी जल के लिए भिक्षा नहीं माँगता फिर भी वह सदैव जल से भरा ही रहता है। इसी तरह यदि व्यक्ति स्वयं को योग्य बनाए तो धन संपत्ति स्वयं ही उसके पास आ जाती है।

शब्दार्थ

न अम्भोधिःnāmbhodhiḥ

समुद्र नहीं

अम्भस् + √धा

अर्थिताम्arthitām

याचना को

√अर्थ्

एतिeti

प्राप्त होता

√इ

सदाsadā

सदा

अम्भोभिःambhobhiḥ

जलों से

अम्भस्

च पूर्यतेca pūryate

और भर जाता है

√पॄ

आत्मा तुātmā tu

आत्मा तो

आत्मन्

पात्रताम्pātratām

पात्रता तक

पात्र

'पात्र' अर्थात् बर्तन और योग्य अधिकारी—दोनों।

नेयःneyaḥ

ले जाना चाहिए

√नी

पात्रम्pātram

पात्र को

पात्र

आयान्तिāyānti

आती हैं

आ + √या

सम्पदःsampadaḥ

सम्पत्तियाँ

सम् + √पद्

व्याख्या

यह श्लोक याचना करने और ग्रहण करने योग्य बनने के बीच अंतर रखता है। समुद्र जल माँगने नहीं जाता; अनेक जलधाराएँ स्वयं उस तक पहुँचकर उसे भरती रहती हैं। दूसरी पंक्ति ‘पात्र’ के श्लेष पर टिकी है, जिसका अर्थ बर्तन भी है और योग्य अधिकारी भी; इसलिए ‘पात्रताम्’ और ‘पात्रम्’ समुद्र का चित्र तथा पात्रता का नैतिक कथन दोनों बचाए रखते हैं। ‘नेयः’ एक कृत्य-प्रत्ययान्त रूप है—आत्मा को पात्रता तक ले जाया जाना चाहिए—इसे णिजन्त क्रिया नहीं कहना चाहिए। व्यावहारिक बल अपनी क्षमता विकसित करने पर है; साथ दिए अर्थ की आत्मनिर्भरता इस अंतर का आधुनिक अनुप्रयोग है।

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सुभाषितावलि से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

सामर्थ्य पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य