श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति - समृद्धि का चक्र

3 फ़र॰ 2026

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥

śrīrmaṅgalāt prabhavati prāgalbhyāt sampravardhate । dākṣyāt tu kurute mūlaṃ saṃyamāt pratitiṣṭhati ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आत्मविश्वास वह शक्ति है, जिसके बल पर सब कुछ संभव है। विकसित भारत के सपने को साकार करने में देशवासियों की यही शक्ति बहुत काम आने वाली है।

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् का अर्थ

शुभ कार्यों से धन अर्जित होता है। यह साहस और आत्मविश्वास से बढ़ता है, कुशलता एवं दक्षता से स्थिर रहता है और संयम द्वारा सुरक्षित होकर राष्ट्र की प्रगति में सहायक बनता है।

शब्दार्थ

श्रीःśrīḥ

श्री

श्री

मङ्गलात्maṅgalāt

मङ्गल से

मङ्गल

प्रभवतिprabhavati

उत्पन्न होती है

प्र + √भू

प्रागल्भ्यात्prāgalbhyāt

प्रागल्भ्य से

प्र + गल्भ

सम्प्रवर्धतेsampravardhate

बढ़ती है

सम् + प्र + √वृध्

दाक्ष्यात्dākṣyāt

दक्षता से

दक्ष

तु कुरुते मूलम्tu kurute mūlam

मूल बनाती है

√कृ + मूल

संयमात्saṁyamāt

संयम से

सम् + √यम्

प्रतितिष्ठतिpratitiṣṭhati

प्रतिष्ठित होती है

प्रति + √स्था

व्याख्या

यह श्लोक श्री (लक्ष्मी/समृद्धि) की प्राप्ति और उसके स्थायित्व के चार अनिवार्य चरणों को दर्शाता है। समृद्धि शुभ कर्मों (मंगल) से उत्पन्न होती है, आत्मविश्वास और साहस (प्रगल्भता) से बढ़ती है, कार्यकुशलता और दक्षता (दाक्ष्य) से जड़ें जमाती है, और अंततः संयम व अनुशासन (संयम) से स्थिर रहती है। यह सिखाता है कि सफलता पाने के लिए कौशल के साथ-साथ अनुशासन भी अनिवार्य है। साझा अर्थ के अंत में राष्ट्र की प्रगति का उल्लेख जोड़ा गया है, जो मूल पाठ में नहीं है। श्लोक 'प्रतितिष्ठति' पर समाप्त होता है—संयम से श्री स्थिर प्रतिष्ठा पाती है; चारों चरण श्री के उदय, वृद्धि, मूल और स्थिरता का क्रम बताते हैं।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

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7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य

समृद्धि पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।

नैतिकताशांतिविद्याअनुशासन