औषधेष्वपि सर्वेषु हास्यं श्रेष्ठं वदन्ति ह। स्वाधीनं सुलभं चैवारोग्यानन्दविवर्धनम्॥
auṣadheṣv api sarveṣu hāsyaṃ śreṣṭhaṃ vadanti ha । svādhīnaṃ sulabhaṃ caivārogyānandavivardhanam ॥
औषधेष्वपि सर्वेषु हास्यं श्रेष्ठं का अर्थ
कहा गया है कि सभी औषधियों में निश्चय ही हँसना श्रेष्ठ औषधि है क्योंकि यह आसानी से बिना मूल्य के उपलब्ध हो जाती है तथा स्वास्थ्य और आनन्द की वृद्धि करती है। अतः मुस्कुराते रहें।
शब्दार्थ
- औषधेषुauṣadheṣu
औषधियों में
ओषधि
- अपि सर्वेषुapi sarveṣu
सभी में
सर्व
- हास्यम्hāsyam
हास्य
√हस्
- श्रेष्ठम्śreṣṭham
श्रेष्ठ
श्रेष्ठ
- वदन्ति हvadanti ha
कहते हैं
√वद्
- स्वाधीनम्svādhīnam
स्वाधीन
स्व + अधीन
- सुलभम्sulabham
सुलभ
सु + √लभ्
- च एवcaiva
और
- आरोग्यानन्दविवर्धनम्ārogyānandavivardhanam
आरोग्य और आनन्द को बढ़ाने वाला
आरोग्य + आनन्द + वि + √वृध्
व्याख्या
श्लोक हास्य को श्रेष्ठ औषधि कहता है क्योंकि वह ‘स्वाधीन’, अर्थात अपने वश में, और ‘सुलभ’, अर्थात सहज उपलब्ध है। बाहर से प्राप्त होने वाली औषधि के विपरीत प्रसन्नता को दैनिक जीवन में विकसित किया जा सकता है और बाँटने पर वह घटती नहीं। यह तुलना हास्य को चिकित्सा का विकल्प नहीं बनाती, बल्कि मानसिक सहजता, सामाजिक आत्मीयता और शारीरिक कल्याण के गहरे संबंध को रेखांकित करती है। इसकी व्यावहारिक शिक्षा है कि आनंद को केवल अवसर विशेष का फल न मानकर स्वास्थ्य का दैनिक साधन समझा जाए। मुस्कान हर रोग नहीं मिटाती, पर तनाव हल्का करती, संबंधों को दृढ़ बनाती और कठिनाई का सामना करने की मानसिक शक्ति बढ़ाती है।
मूल पोस्ट
स्वास्थ्य पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।