हास्यं श्रेष्ठं औषधं - सबसे उत्तम औषधि

4 फ़र॰ 2026

औषधेष्वपि सर्वेषु हास्यं श्रेष्ठं वदन्ति ह। स्वाधीनं सुलभं चैवारोग्यानन्दविवर्धनम्॥

auṣadheṣv api sarveṣu hāsyaṃ śreṣṭhaṃ vadanti ha । svādhīnaṃ sulabhaṃ caivārogyānandavivardhanam ॥

औषधेष्वपि सर्वेषु हास्यं श्रेष्ठं का अर्थ

कहा गया है कि सभी औषधियों में निश्चय ही हँसना श्रेष्ठ औषधि है क्योंकि यह आसानी से बिना मूल्य के उपलब्ध हो जाती है तथा स्वास्थ्य और आनन्द की वृद्धि करती है। अतः मुस्कुराते रहें।

शब्दार्थ

औषधेषुauṣadheṣu

औषधियों में

ओषधि

अपि सर्वेषुapi sarveṣu

सभी में

सर्व

हास्यम्hāsyam

हास्य

√हस्

श्रेष्ठम्śreṣṭham

श्रेष्ठ

श्रेष्ठ

वदन्ति हvadanti ha

कहते हैं

√वद्

स्वाधीनम्svādhīnam

स्वाधीन

स्व + अधीन

सुलभम्sulabham

सुलभ

सु + √लभ्

च एवcaiva

और

आरोग्यानन्दविवर्धनम्ārogyānandavivardhanam

आरोग्य और आनन्द को बढ़ाने वाला

आरोग्य + आनन्द + वि + √वृध्

व्याख्या

श्लोक हास्य को श्रेष्ठ औषधि कहता है क्योंकि वह ‘स्वाधीन’, अर्थात अपने वश में, और ‘सुलभ’, अर्थात सहज उपलब्ध है। बाहर से प्राप्त होने वाली औषधि के विपरीत प्रसन्नता को दैनिक जीवन में विकसित किया जा सकता है और बाँटने पर वह घटती नहीं। यह तुलना हास्य को चिकित्सा का विकल्प नहीं बनाती, बल्कि मानसिक सहजता, सामाजिक आत्मीयता और शारीरिक कल्याण के गहरे संबंध को रेखांकित करती है। इसकी व्यावहारिक शिक्षा है कि आनंद को केवल अवसर विशेष का फल न मानकर स्वास्थ्य का दैनिक साधन समझा जाए। मुस्कान हर रोग नहीं मिटाती, पर तनाव हल्का करती, संबंधों को दृढ़ बनाती और कठिनाई का सामना करने की मानसिक शक्ति बढ़ाती है।

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devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

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स्वास्थ्यकल्याण