देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या का अर्थ
जिस परम शक्ति से पूरा संसार संचालित होता है और जिसमें सभी देवताओं की शक्तियाँ समाहित हैं, उन माँ अम्बिका को हम पूरी श्रद्धा और भक्ति से नमन करते हैं। वस्तुतः देवता और महर्षि भी उनकी आराधना करते हैं। माँ अम्बिका हम सबका कल्याण करें।
शब्दार्थ
- देव्याdevyā
देवी के द्वारा
- ययाyayā
जिनके द्वारा
- ततमिदंtatamidaṃ
यह व्याप्त है; ततम् + इदम्
- जगदात्मशक्त्याjagadātmaśaktyā
जगत्, अपनी शक्ति से; जगत् + आत्मशक्त्या
- निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्याniśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā
उनके द्वारा, जिनका स्वरूप समस्त देवगणों की शक्तियों का समूह है
- तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यांtāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ
उन अम्बिका को, जो सभी देवताओं और महर्षियों से पूजित हैं; ताम् + अम्बिकाम् + अखिलदेवमहर्षिपूज्याम्
- भक्त्याbhaktyā
भक्ति से
- नताःnatāḥ
नमन करते हुए
- स्मsma
हम हैं; अस् धातु का उत्तम पुरुष बहुवचन रूप
- विदधातुvidadhātu
वे प्रदान करें
- शुभानिśubhāni
शुभ फल, मंगल
- साsā
वे
- नःnaḥ
हमारे लिए
व्याख्या
इस प्रार्थना में अम्बिका को उन देवी के रूप में नमन किया गया है जिनकी अपनी शक्ति से पूरा जगत् व्याप्त है। निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या का लंबा समास बताता है कि उनका स्वरूप सभी देवताओं की शक्तियों का समूह है और कोई भी देवशक्ति इससे बाहर नहीं है। देवता और महर्षि भी उनकी पूजा करते हैं, और प्रार्थना करने वाले भक्ति से उनके सामने नत होते हैं। अंतिम पदों में देवी से हमारे लिए शुभ फल देने की कामना है, इसलिए इसमें साथ प्रार्थना करने वालों का कल्याण भी सम्मिलित है। आज का पाठक इसे जीवन को धारण करने वाली शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और अपनी व्यक्तिगत चिंताओं से आगे बढ़कर मंगल माँगने की प्रार्थना के रूप में पढ़ सकता है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
देवी महात्म्यम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatam idaṁ jagad ātmaśaktyā niśśeṣa-devagaṇa-śakti-samūha-mūrtyā । tām ambikām akhila-deva-maharṣi-pūjyāṁ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्य का यह मंत्र उस जगदम्बा को नमन करता है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और समस्त शक्तियों के एकीकृत सामर्थ्य का साक्षात् स्वरूप हैं।
भक्ति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।