दर्शनोपनिषद् से सुभाषित
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नवीनतम अद्यतन: 21 जून 2026
26 मई 2026
दर्शनोपनिषद्
आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः। अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छुद्धो भवत्ययम्॥
ātmā śuddhaḥ sadā nityaḥ sukharūpaḥ svayaṃprabhaḥ । ajñānān malino bhāti jñānāc chuddho bhavaty ayam ॥
दर्शनोपनिषद् का यह मंत्र आत्मा के नित्य, शुद्ध और स्वयंप्रकाश स्वरूप को बताते हुए अज्ञान के आवरण को ज्ञान से दूर करने की प्रेरणा देता है।
आत्मज्ञानविद्या